Saturday, November 2, 2013

पाती प्रेम भरी

चाहता हूँ तुम्हे प्रेषित
करना पाती प्रेम भरी
कुछ हृदय के हाल बयाँ है
कुछ शब्दो की जादूगरी

प्रिये तुम बिन घर है सूना
सूना कमरा सूनी गलियां
जुल्फों में लगने को कायल
कारी पड़ गयी
गज़रे की कलियाँ
मन के तपते रेगिस्तां में
आवो बन के सावन की झरी 
चाहता हूँ तुम्हे प्रेषित
करना पाती प्रेम भरी .... 

अपने आप से बतियाता हूँ
सब पगला मुझे माने हैं
प्रेम रोग से गर्सित हूँ पर
वो नादाँ कहाँ जाने हैं
मुझे देख मोरे निकट ना आवे
कैसी विपदा आन परी
चाहता हूँ तुम्हे प्रेषित
करना पाती प्रेम भरी ....

हर इक शख्स में अक्स तुम्हारा
जिस पर भी प्रिये नज़र परे
इसी चक्कर में शायद हमने
सखा के मुख पर अधर धरे
जो भी मेरे पास खड़ा हो
मैं तो समझु
तुम ही खरी
चाहता हूँ तुम्हे प्रेषित
करना पाती प्रेम भरी ....

अब तो प्रिये आन मिलो तुम
और ना हमको तरसावो
प्रेम अनल में पत्थर दिल को
थोरा सा तो पिघराओ
ख़त को प्रिये तार समझ कर
इस घर की पकड़ो डगरी
चाहता हूँ तुम्हे प्रेषित
करना पाती प्रेम भरी ....