Sunday, January 4, 2015

शहर अजनबी सा हो गया..

पता पूछता हूँ सबसे...
अपने घर का ही यारो
उसके दर से क्या उठा कि
शहर अजनबी सा हो गया..

ये वक़्त का तकाज़ा था
या फितरत का जनून जानी
जो मिलता था हर रोज़ सनम
वो कभी कभी सा हो गया।

रफ्ता रफ्ता उसको चाहा
रफ्ता रफ्ता दुनिया पलटी
जो होता था आसमान सा
अब वो भी जमीं सा हो गया।

कुछ तो जादू करते होगे
करामात नज़रों की होगी
शोला सा मन बावरा कैसे
अब शबनमी सा हो गया

जुल्फ रागिनी, बोल तरन्नुम
हंसी ग़ज़ल का मुखड़ा थी
एक पल का मिलना था लेकिन
मैं भी कवि सा हो गया।

एक जिन्दगी गुजारी है

हमने तो सदा दी थी,
अब बारी तुम्हारी है
और अब इंतज़ार कितना
एक जिन्दगी गुजारी है
हमने तो सदा दी थी........

तुम्हारे तो नहीं...??

वक़्त के स्याह कागज़ पर
मैंने जिन्दगी की कलम से
कुछ अक्स उतारे है..तुम्हारे तो नहीं..

सर्दी की गर्म रातो में
आसमां की चादर में
जितने हसीं तारे है..तुम्हारे तो नहीं..

सिमट गयी है चांदनी
अँधेरे से डर गयी
ये रौशनी के जो नज़ारे है..तुम्हारे तो नहीं...

खुश्क हुआ था कबसे
ये दरिया तो मगर
आज अश्को के धारे हैं ...तुम्हारे तो नहीं...