पता पूछता हूँ सबसे...
अपने घर का ही यारो
उसके दर से क्या उठा कि
शहर अजनबी सा हो गया..
ये वक़्त का तकाज़ा था
या फितरत का जनून जानी
जो मिलता था हर रोज़ सनम
वो कभी कभी सा हो गया।
रफ्ता रफ्ता उसको चाहा
रफ्ता रफ्ता दुनिया पलटी
जो होता था आसमान सा
अब वो भी जमीं सा हो गया।
कुछ तो जादू करते होगे
करामात नज़रों की होगी
शोला सा मन बावरा कैसे
अब शबनमी सा हो गया
जुल्फ रागिनी, बोल तरन्नुम
हंसी ग़ज़ल का मुखड़ा थी
एक पल का मिलना था लेकिन
मैं भी कवि सा हो गया।
अपने घर का ही यारो
उसके दर से क्या उठा कि
शहर अजनबी सा हो गया..
ये वक़्त का तकाज़ा था
या फितरत का जनून जानी
जो मिलता था हर रोज़ सनम
वो कभी कभी सा हो गया।
रफ्ता रफ्ता उसको चाहा
रफ्ता रफ्ता दुनिया पलटी
जो होता था आसमान सा
अब वो भी जमीं सा हो गया।
कुछ तो जादू करते होगे
करामात नज़रों की होगी
शोला सा मन बावरा कैसे
अब शबनमी सा हो गया
जुल्फ रागिनी, बोल तरन्नुम
हंसी ग़ज़ल का मुखड़ा थी
एक पल का मिलना था लेकिन
मैं भी कवि सा हो गया।