Sunday, December 30, 2012

मायने

बदल गए हैं मायने इंसान के
खिल उठे हैं चेहरे हैवान के
अब नहीं अवतार लेगा ए नवीन
टूट गए हैं हौसले भगवान के .....

मरहम भी लगा देंगे मगर मालूम हो  
जख्म कितने बाकी हैं हिन्दुस्तान के ......

हो गए बुलंद कातिलों के अंदाज़
सबूत छोड़ते हैं अपनी पहचान के ......

हर तरफ मिल जायेंगे अब सनम
क्या करोगे लिख कर पते शमशान के .....

टूट गए हैं हौसले भगवान के .....

Friday, December 28, 2012

पौधारोपण

वन महोत्सव के अवसर पर
एक नेता ने किया उद्घोषण
आज करेंगे हम भी अपने
करकमलों से पौधारोपण
बड़ा हुआ वो वृक्ष  जब सींचा
हुआ अचरज़ बड़ा भारी भरकम
फूल पत्तियों की जगह थी गोली
जगह फलों के लटके थे बम
मत सींचो मतलब की खातिर
तुम देश के नोनिहालों को
सींचो तो फिर सींचो ऐसे
ज्यों किसान खेत खलिहानों को .....ज्यों किसान खेत खलिहानों को।

हलवा

महंगाई के दौर में मेरे
मन ने की भरी गुस्ताखी
भूले भटके किसी कोने से
हलवा खाने की इच्छा जागी।
सर पर बांधा कफ़न
दिल में कुछ हिम्मत जुटाई
कंपकंपाते हुए होठों से
बीबी को इच्छा जतलाई।

तमतमा गया चेहरा उसका
छा गई आँखों में लाली
जपने लगा हनुमान चालीसा
उसने जो कोप दृष्टि डाली।

बोली होश में भी हो तुम
जेब पे अपनी नजर तो डालो
ले आओ सामान तो जानू
चाहे फिर जितना हलवा खालो।

आ गई अब तो आन पे मेरी
मर्दानगी को था ललकारा
लाऊं कहीं से भी पैसे मैं
इसके सिवा नहीं था चारा।

बैंक टटोले, जेब में झाँका
यारो पे भी नजर दोडाई
घिस गई सारी जूती मेरी
कौड़ी मगर हाथ न आई।

मनोदशा को भांप के मेरी
एक ने यूँ हमदर्दी जतलाई
नोट थमा के सौ का मुझको
हाथ घडी मेरी खुलवाई।

इंसानियत भी चीज़ है कोई

ताव दे वो मूँछो पर बोला

क्या होगा पर मेरा कल को
ईमान तुम्हारा  गर जो डोला।

सामान थमा कर बीबी को खैर
फूला नहीं समाया था
सर था मेरा गर्व से ऊँचा
जो किला फ़तह कर आया था।

हलवे की भीनी भीनी खुश्बू
नथुनों से मेरे आ टकराई
बरसों से थी जिसकी तमन्ना
आज वो पूरी होने आई।

किस्मत को मंजूर नहीं थे
सुख के पर मेरे पल ये चार
जाने कहाँ से टपक पड़े हाय
मेरे दूर के रिश्तेदार।

जनम जनम के भूखे मानो
सारे हलवे पर यूँ टूटे
चाट गए बर्तन तक सारे
भाग मेरे हाय यूँ फूटे ...भाग मेरे हाय यूँ फूटे।।।।।।।।








Wednesday, December 26, 2012

चंचल बाला

  

चतुर चपल एक चंचल बाला 
सादगी का ओढ़ दुशाला
जब जब नज़रों से बतियाती
तब तब लगती मधुशाला

चतुर चपल एक चंचल बाला

 

सुरभि बन वो वन महकाए
तन बदन जोबन लहराए
मोती बन वाणी झरती है
जब जब खोले लबों का प्याला

चतुर चपल एक चंचल बाला

 

अमावस सी जुल्फों की छाया
कुंदन तन और कंचन काया
नैनों में है झील बसेरा
मुख मंडल का तेज निराला

 चतुर चपल एक चंचल बाला

 

कोमल मन सी राजकुमारी
कायनात सारी बलिहारी
जिस घर अंगना जायेगी
होगा वो किस्मत वाला

चतुर चपल एक चंचल बाला

 

सादगी का ओढ़ दुशाला
जब जब नज़रों से बतियाती

तब तब लगती मधुशाला

Saturday, December 22, 2012

ए जिन्दगी सता सता तू मुझे और सता

ए जिन्दगी सता सता तू मुझे और सता
भाग जितना भाग सकती है भाग
पर याद रख
तेरा पीछा ना छोडूंगा
भाग कर जायेगी कहाँ
मुझे मालूम है तेरा हर पता ...... ए जिन्दगी सता सता तू मुझे और सता

याद कर बचपन के दिन
जवानी की राते
जब तू रोज़ ..हँस हँस कर मिलती थी
हर दिन इक बहार थी ...तू गुलशन की कली सी खिलती थी
बचपन जवानी क्या बीते .... तू  बीत गयी ...तू रीत गयी 
तू क्यों बीती ..तू क्यों रीती
जरा ये तो बता ....ए जिन्दगी सता सता तू मुझे और सता

तू क्या सोचती है कि मैं डर जाऊंगा
थक जाऊंगा, हार जाऊंगा या मर जाऊंगा
मगर याद रख..
ये तेरी भूल है
मुझे तुझसे प्यार है
और तेरे हर सितम कबूल है
हाँ ..तुझे जो शिकवे शिकायत है
वो और बात है अलबत्ता ......ए जिन्दगी सता सता तू मुझे और सता

तेरी धुप छावं में ...सुबहो और शाम में
मैं पक  चुका  हूँ
पर लोग समझते हैं कि  मैं रुक चुका हूँ ....थक चुका  हूँ
मगर ए जिन्दगी 
ना मैं रुका हूँ ना थका हूँ
मैं समझ गया हूँ जिन्दगी तेरा रंगों को .... तेरे ढंगों को
सुख दुःख आशा निराशा .... उम्मीदों और उमंगो को
और जान गया हूँ जिन्दगी
कि तेरी नहीं इसमें कोई ख़ता
....ए जिन्दगी सता सता तू मुझे और सता
भाग जितना भाग सकती है भाग
पर याद रख
तेरा पीछा ना छोडूंगा
भाग कर जायेगी कहाँ
मुझे मालूम है तेरा हर पता ...... ए जिन्दगी सता सता तू मुझे और सता





हिन्दोस्तां मेरा वापस ला दो

बदलते वक़्त में शायद तुम
इतने मतलबी हो गए हो
इतिहास के पन्नों में दुबक कर
आराम से जो सो गए हो
उठो भगत, सुभाष उठो ..
पटेल, तिलक तुम भी जागो
जाने कहाँ पर खो गया वो ...
हिन्दोस्तां मेरा वापस ला दो

थक गए बहुत ये माना
है आराम जरुरी भी
या तो खुद आ जाओ वरना
अपने जैसा हमें बना दो
जाने कहाँ पर खो गया वो ...
हिन्दोस्तां मेरा वापस ला दो

बलिदान तुम्हारा हम सब भूले
आज़ादी के मद में चूर
विलासता में जकड़े हुए हैं
जंजीरों से मुक्त करा दो
जाने कहाँ पर खो गया वो ...
हिन्दोस्तां मेरा वापस ला दो






Friday, December 21, 2012

कुछ तो याद करो

 वो बहकती जुबान वो फिसलती नज़र
मिलने की कसक ..वियोग तड़प
कोमल हाथों का मासूम स्पर्श
......कुछ तो याद करो

प्रत्येक झलक को आतुर मन
फिर हृदय को वो तीव्र स्पंदन
और स्पर्श मात्र से कांपता तन
.....कुछ तो याद करो

पिछवाड़े वो बाग़ का कोना
शिकवे गिलों में समय का खोना
दुनिया का कोई  डर ना होना
..... कुछ तो याद करो

अंखियों में अंसुवन की थिरकन
एक दूजे से करती शिकवन
धड़कन से फिर मिलती धड़कन
.....कुछ तो याद करो

मिल कर कुछ करने की कसमें
कदम थामती अनजान सी रस्में
कुछ बस में तो कुछ ना बस में
....कुछ तो याद करो
....कुछ तो याद करो 

Friday, December 14, 2012

सारे जहाँ से कैसे कह्दु ......अच्छा हिंदुस्तान

 
चमन यहाँ वीरान पड़े है
चारो तरफ हैवान खड़े है
अबलाओं की खैर नहीं है
जहाँ भी देखो बैर वहीँ है
प्यार तो अब ढूंढे नहीं मिलता
अमन का कोई फूल न खिलता
यहाँ वही है , वहां वही है , जहाँ भी देखो वहां वही है
यहाँ वही है , वहां वही है , जहाँ भी देखो वहां वही है
है क्या बस ..............शमशान
                                                सारे जहाँ से कैसे कह्दु अच्छा हिंदुस्तान 
                                                सारे जहाँ से कैसे कह्दु अच्छा हिंदुस्तान
हालत देखो कैसी खस्ता
बच्चे से भारी  है बस्ता
खो खो कब्बडी ये सब भूले
खेतो में पीपल के झूले
दूध दही सब बीती बाते
कोक्क और पेप्सी इन्हें सुहाते
सिगरेट बीडी फूँक रहे है, पान मसाला थूक रहे है
सिगरेट बीडी फूँक रहे है, पान मसाला थूक रहे है
ये नन्हे ........नादान
                                                सारे जहाँ से कैसे कह्दु अच्छा हिंदुस्तान 
                                                सारे जहाँ से कैसे कह्दु अच्छा हिंदुस्तान

आज का श्रवन कैसा श्रवन
प्रेयसी पर तो जान भी अर्पण
मात पिता बीमार बड़े है
 श्रवन जी पर पी के पड़े है
जब भी उनको खांसी उठती
नाक भौं  श्रवन की सिकुड़ती
ज़रा भी बूढ़े नहीं लज्जाते
कैसे कैसे जर्म फैलाते
कैसी आफत गले पड़ी है,जाने कोन वो शुभ घडी है
कैसी आफत गले पड़ी है,जाने कोन वो शुभ घडी है
जब निकले इनके............प्राण
                                                सारे जहाँ से कैसे कह्दु अच्छा हिंदुस्तान 
                                                सारे जहाँ से कैसे कह्दु अच्छा हिंदुस्तान
इक दूजे को  काट रहे है
धरती को भी बाँट रहे है
मंदिर मस्जिद के ये झगडे
जाने कैसे कैसे रगड़े
मानवता इन्हें छोड़ चुकी है
सच्चाई दम तोड़ चुकी है
रिश्ते नातो को झुठलाते, न शर्माते न लज्जाते 
रिश्ते नातो को झुठलाते, न शर्माते न लज्जाते
ये कैसे .............इन्सान
                                               सारे जहाँ से कैसे कह्दु अच्छा हिंदुस्तान 
                                                सारे जहाँ से कैसे कह्दु अच्छा हिंदुस्तान
जब इंसा भाई भाई होगा
कहीं ना आताताई होगा
धर्म कर्म की बाते होगी
सुखमय दिन और राते होगीं
यौवन यौवन सा महकेगा
बचपन, बचपन सा चहकेगा 
जिस दिन डर , डर कर भागेगा
झूठ मरेगा , सच जागेगा
उस दिन ए ...........भगवान्

सारे जहाँ से कह्दुंगा मैं .. अच्छा हिंदुस्तान
सारे जहाँ से कह्दुंगा मैं .. अच्छा हिंदुस्तान 

Wednesday, August 22, 2012

प्यारी प्यारी बिटिया

सो जा री  बिटिया , प्यारी प्यारी बिटिया
सुंदर सुंदर बिटिया, तू न्यारी न्यारी बिटिया
सो जा री बिटिया ......

बिटिया के हाथो में
मम्मी की चूड़ी
बिटिया के पैरों में
पापा की जुती
और माथे लगाई बिंदिया
सो जा री बिटिया, प्यारी प्यारी बिटिया
सुंदर सुंदर बिटिया, तू न्यारी न्यारी बिटिया


बिटिया की आँखों में
सुंदर सुंदर सपने
सपने ये सारे
होते जो अपने
राज कराती निंदिया
सो जा री बिटिया, प्यारी प्यारी बिटिया
सुंदर सुंदर बिटिया, तू न्यारी न्यारी बिटिया

बिटिया के बालों में
फूलो का गजरा
खुश्बू  से महका
आँगन ये सगरा
 और महके बगिया
सो जा री बिटिया, प्यारी प्यारी बिटिया
सुंदर सुंदर बिटिया, तू न्यारी न्यारी बिटिया

बिटिया के कानो में
सोने की बाली
बाली में चमके
हीरे की नाली
नाक चढाए नथिया 
सो जा री बिटिया, प्यारी प्यारी बिटिया
सुंदर सुंदर बिटिया, तू न्यारी न्यारी बिटिया


बिटिया हमारी,
 सुंदर प्यारी
सारे जग की
राज दुलारी
ऐसी हमारी बिटिया  
सो जा री बिटिया, प्यारी प्यारी बिटिया
सुंदर सुंदर बिटिया, तू न्यारी न्यारी बिटिया






Saturday, July 28, 2012

हे राम तुम कब आओगे

हे राम तुम कब आओगे
हे प्रभु तुम कब आओगे
दरस को तरसे नैन हमारे
कब नैनन प्यास बुझाओगे
हे राम तुम कब आओगे....
पाप का जब भी घड़ा भरता है
सुनते थे तुम आते हो
पापों के तो घड़े भरे हैं
क्यों मंद मंद मुस्काते हो
बहुत लिए मुस्काए अब कब
रोद्र रूप दिखाओगे
हे राम तुम कब आओगे ....
क्यों सिमट गए हो प्रभो मेरे 
मंदिर की चारदीवारी में 
खुले घूमते रावण देखो 
आपकी इस लाचारी में 
इन सबकी नाभि भेदने 
कब धनु प्रत्यंचा चढाओगे 

हे राम तुम कब आओगे ....


दो गज जगह पे तुम्हे बसाने 
कितनी मारामारी है 
नादाँ है वो ना जाने 
ये वसुंधरा ही तुम्हारी है 
छोटी सी इक बात है लेकिन 
कब इनको समझाओगे 
हे राम तुम कब आओगे 
चेताता हूँ आ जावो 
निवेदन कर के मैं तो हारा 
गुस्ताखी है तो वही सही 
माना हूँ मैं भक्त तुम्हारा 
अनुनय से तो असर नहीं 
पर अब डर कर तो आओगे 
हे राम तुम कब आओगे 
हे प्रभु तुम कब आओगे 
दरस को तरसे नैन हमारे 
कब नैनन प्यास बुझाओगे



धरती माँ

तेरा ही बाशिंदा हूँ
धरती माँ शर्मिंदा हूँ
हरियाली का था तेरा ओढ़ना
नदिया थी तेरी रक़त शिरा
घुमड़ घुमड़ इतराते थे बादल
रिम झिम रिम झिम नीर गिरा
हरे भरे और सुन्दर वन
सदा से तेरा ढकते थे तन
पर्वतो की लम्बी माला
रूप देख खो जाता था मन
पर मानव ने क्या कर डाला
फाड दिया तेरा हरा दुशाला
पशु पक्षी और जंतु सारे
जीभ की खातिर इसने मारे
विकास के नाम का ओढ के चोला
गर्भ को तेरे खूब टटोला
गैस तेल जो कुछ भी फूटा
लालच इतना सब कुछ लूटा
जीव जंतु चुन चुन के मारे
काट दिए वन उपवन सारे
लालच में  यू मन क्या डोला
फसलों में भी जहर को घोला
.......................हैरानी है कि जिन्दा हूँ
.......................धरती माँ शर्मिंदा हूँ
माना विकास जरुरी है
वर्ना जिन्दगी अधूरी है
पर कुछ सोच भी करनी होगी
वर्ना कीमत भरनी होगी
क्या होगा जब वन ना होंगे
और जीव और जन ना होंगे
वायु इतनी दूषित होगी
जनता सारी कुपोषित होगी
वो जीवन क्या जीवन होगा
रोगी रोगी हर तन होगा
नहीं नहीं अब तो जागो
जिम्मेदारी से न भागो
धरती को हम फिर से सजाये
हर एक जन एक वृक्ष लगाए
नहीं करे बर्बाद फ़िज़ूल ही
पानी तेल या घर कि बिजली
जीव जंतु है मित्र हमारे
जीने का हक रखते सारे
अभी भी इतनी देर नहीं है
शाम हुई अंधेर नहीं है
प्रकृति को हम अपनाए
धरती को दुल्हन सा सजाये
फिर ना कभी मुह से निकले
कि धरती माँ शर्मिंदा हूँ
कि धरती माँ शर्मिंदा हूँ