बड़े जतन से आंगन मैंने.....
फूल कोई एक पाला था।।।
पानी और कुछ खाद सहारा
जाने कैसे संभाला था।।
एक दिन उससे कुछ बात हुई....
यूँ छोटी सी मुलाकात हुई...
कुछ उसके गहरे सवाल भी थे
आंखों सपनो के जाल भी थे।।
गमले में मुझको रोका है?
क्यो मुझसे किया ये धोखा है...
मैं भले खिला सा दिखता हूँ...
पर भीतर भीतर रिसता हूँ।।।
यहां तितली कोई नही आती...
कोयल भी गीत नही गाती...
मुझ पर तो छाई उदासी है...
क्यों कैद में जंगल वासी है...
ये सुन कर मैं भी चकराया
फिर मैंने उसको समझाया..
झूठे सपनो को नही बोते..
अब जंगल यहाँ नही होते
ये जंगल हम सब काट चुके
धरती आपस में बाँट चुके
अब धरती खोज न पाओगे
तुम रोते ही रह जाओगे
काहे खुद पे शर्मिंदा हो
खुश रहो कि अब तक जिंदा हो
खुश रहो कि अब तक जिंदा हो........
