कितना भीतर बदल गया है, कितना बदला जाए रे।
कल तक भाए खेल खिलौने, अब ना तुझे सुहाए रे।।
बंगला पैसा मोटर गाड़ी, साधन कितने जोड़ लिए।
गैरों के संग मीत बढाने, अपनो से दिल तोड़ लिए।।
झूठी तेरी मृग तृष्णा, हाथ नही कुछ आये रे।
कितना भीतर बदल गया है, कितना बदला जाए रे।।।
चाम दाम की चमक दमक है, किस्सा सारा पल भर का।
भीतर का फल चख ले प्यारे, छिलका हटा के ऊपर का।
सोने के बिस्तर पे सोने, की आदत क्यों छूट गई।
सच की दौलत बहुत घनी थी, झूठ की नगरी लूट गई।।
पाप का दलदल लाख बुलाये, काहे गोते खाये रे।।
कितना भीतर बदल गया है, कितना बदला जाए रे।।।।।
लोभ की तेरे इस गठरी का, अंत कहा पर होगा रे।
जिसने मन मे मैल धरी है, उसने फल है भोगा रे।।
कब झाँका तू भीतर अपने, देख मैल का ढेर घना।
कपट की मकड़ी घूम रही है, देखो कितने जाल बना।।
मन की चादर इतनी मैली,कैसे तुझे सुहाए रे।
कितना भीतर बदल गया है, कितना बदला जाए रे।।।।
सारा जीवन मेरा मेरा करते तेरा बीत गया
जितना चाहे जोड़ा तूने, जाते जाते रीत गया
माया के पीछे पागल, दुनिया की अजब कहानी है
खाली हाथ ही आई जग में, खाली हाथ ही जानी है
ऐसी ठगनी माया के, खोने का दर्द सताये रे
कितना भीतर बदल गया है, कितना बदला जाए रे।
राग द्वेष के बंधन सारे, जब तक तू न खोलगा
तेरा दुख ही आकर तेरे, सर चढ़ कर ही बोलेगा।
सच के रस्ते चल कर प्यारे, मैल तेरी धूल जायेगी,
जितनी परते जमी पड़ी है, पल मे सब घुल जायेगी।
दुख के खुद तु गले पड़ा है, सुख तो तुझे बुलाये रे।
कितना भीतर बदल गया है, कितना बदला जाए रे।।।।