Wednesday, April 20, 2016

कोने का बुत

सजा कर घर के कोनो को

आप कितना सताते हैं

हमें ना हुक्म हिलने का है

ना हम बैठ पाते है।।

भले ठहरे हम बुत लेकिन

हैं कुछ अरमान हमारे भी

बहती धार को ज्यों देख

मचल जाते किनारे भी

बढ़ कर थाम लें दामन

ये अरमा दिल में आते है

हमें ना हुक्म हिलने का है

ना हम बैठ पाते है।।

हमसे बेरुखी इतनी 

नहीं अच्छी है जानो तुम

क़यामत सर हमारे है

मानो या ना मानो तुम

जिन्दा हैं कि छूते हो

भले आप धूल हटाते हैं

हमें ना हुक्म हिलने का है

ना हम बैठ पाते है।।

डर है कब सजावट तुम

इस कोने की बदल दोगी

हटा कर मुझे किसी सुंदर

नए बुत को पहल दोगी

जुदाई कबूल अगर आंसू

आपकी आँखों भी आते है

हमें ना हुक्म हिलने का है

ना हम बैठ पाते है।।

जमाने के लिए

आती है खुश्बू उस पसीने से सदा
जो बहता है मेहनत की कमाने के लिए
चलना तो फितरत है जिंदगी तेरी
ढूंढ लेती है जगह नए रास्ते बनाने के लिए
नज़रें बचा कर निकलूं कब तक
हर मोड़ पे है किस्मत नए अफ़साने के लिए
किसने मांगे है यहाँ महल दो महले
एक कांधा ही बहुत है हमे सर छुपाने के लिए
किस किस को नाराज़ करे बगावत कर के
सह लेंगे अगर दुनिया बैठी है सितम ढाने के लिए
इस हक़ीक़त ने हमें तोडा है कयामत की तरह
कोई अपना तो हुआ, पर हुआ जमाने के लिए
दिल करता है लूटा दू  जमाने की दौलत
जब लेती है 10 रूपये बिटिया सर दबाने के लिए☺