अपनी लाडो की डोली पर
क्या दुःख भी कम रहा होगा
ऊपर से मुस्काता बापू
भीतर नम रहा होगा , भीतर नम रहा होगा।
क्या दुःख भी कम रहा होगा
ऊपर से मुस्काता बापू
भीतर नम रहा होगा , भीतर नम रहा होगा।
दुनिया का दस्तूर यही, तू उडके पराये घर जाना
बाबुल की याद ना करना, हर पल हर दिन मुस्काना,
तेरी ख़ुशी में खुश है हम सब,
ये भी बेदम कहा होगा।
ऊपर से मुस्काता बापू
भीतर नम रहा होगा , भीतर नम रहा होगा।
बाबुल की याद ना करना, हर पल हर दिन मुस्काना,
तेरी ख़ुशी में खुश है हम सब,
ये भी बेदम कहा होगा।
ऊपर से मुस्काता बापू
भीतर नम रहा होगा , भीतर नम रहा होगा।
गुमसुम सा है भाई भी,
टूट गई है माई भी,
कल तक जो लाडो अपनी थी,
हो गई आज पराई भी,
चेहरे सुने मन पत्थर,
तूफान परचम रहा होगा
ऊपर से मुस्काता बापू
भीतर नम रहा होगा , भीतर नम रहा होगा।
भीतर नम रहा होगा , भीतर नम रहा होगा।
गुडिया भी खामोश खड़ी है,
चुप हैं सारे खिलौने भी,
किसके संग अब खेल करे वो,
किस संग जाए सोने भी,
Tujhse bichhudne का हर लम्हा,
कदम कदम सहा होगा....
ऊपर से मुस्काता बापू
भीतर नम रहा होगा , भीतर नम रहा होगा।
यूं ही तो ये रंज नहीं है,
यूं ही तड़प नहीं होती।
दर्द ना छलके सीने में तो,
कोई आंख नहीं रोती
तुझसे रिश्ता मेरी लाडो,
जन्मों जन्म रहा होगा।
ऊपर से मुस्काता बापू
भीतर नम रहा होगा , भीतर नम रहा होगा।