Thursday, December 25, 2014

अलविदा माँ अलविदा.....

माँ, ये मेरा पहला और आखिरी ख़त है तुमसे
इसके बाद ये बेटी तुमसे कुछ नहीं कह पाएगी
माँ, जब मेरे आने का एहसास तुम्हारे मन में आया था
माँ, जब तेरे गर्भ में मैंने अपना वजूद बनाया था
तब तुम्हारे मन में ममता की लहरें हिलोरी थी
और उस एहसास मात्र से ही तुमने कितनी खुशियां बटोरी थी
तुम पल छिन पल छिन गिना करती थी
तुम मेरे आने के सपने बुना करती थी
मुझे याद है माँ, जब मैं तेरी कोख में हिला करती थी
तुम्हे उस जानलेवा दर्द में भी कितनी ख़ुशी मिला करती थी
तेरी ममता की उस छाँव में माँ, मुझे कोई चिंता कोई फ़िक्र ना था
ना ही मुझे दुनिया की किसी बात का कोई डर था
मैं तेरी कोख में जो थी
परन्तु जैसे ही मेरा वजूद बेटी के रूप में ढला
माँ तुम बिलकुल बदल गई
तुम्हारे चेहरे पर रहने वाले खुशियों के बादल यकायक गायब हो गए
तुम्हारी ममता ने जब नफरत का रूप ले लिया, मुझे यकीं ही नहीं हुआ माँ
मैं हैरान और अवाक रह गई माँ, जब मुझे पता लगा कि
तुम मुझे दुनिया में लाने से पहले ही दुनिया से विदाई की तैयारी कर रही हो
सच में माँ, यकीं ही नहीं हुआ
बहुत चीखी बहुत चिल्लाई थी माँ
किस प्रकार वो चाक़ू छुरी मेरे अधबने जिस्म के टुकड़े टुकड़े कर रहे थे
पर तेरे चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी
हाँ, मुझसे छुटकारा पाने का एक संतोष जरुर था
माँ ये मेरा क़त्ल नहीं, ये एक ममता का क़त्ल था
मुझे दुनिया में तो आने देती माँ
मेरी काबिलियत दुनिया को तो दिखाने देती माँ
मैं भी कोई इंदिरा, कोई कल्पना बन सकती थी माँ
या फिर मदर टेरेसा बन कर तुम्हारा नाम रोशन कर सकती थी माँ
बेटो कि चाहत तो बुरी नहीं पर इतना तो सोचती माँ
अगर बेटिया ही नहीं रहेंगी तो कहाँ से होंगे बेटे भी
अंत में माँ, बस इतनी विनती है
कि किसी मासूम बेटी को कोख में मारने से पहले इतना जरुर सोचना
कि क़त्ल बेटी का नहीं, क़त्ल ममता का है, क़त्ल इंसानियत का है, क़त्ल पूरी प्रकृति का है....
अलविदा माँ अलविदा.....

तेरा मुझको कहीं नज़र आना..

मेरे दिल को सकून देता है, तेरा मुझको कहीं नज़र आना..
छुप छुप के तेरा शर्माना, शर्मा के फिर से छुप जाना ...
मेरे दिल को सकून देता है, तेरा........

Sunday, November 9, 2014

जिन्दगी

रूकती नहीं है तू किसी के जाने में
कुछ नहीं रखा किसी बहाने में
रूठना तो बस एक आदत है जिन्दगी तेरी
बड़ा मज़ा आता है तुझे मनाने में....
एक एक हालात से वाकिफ हूँ मगर
तेरी हर सौगात से वाकिफ हूँ मगर
जख्म भी दिए तो दिए इतने
उम्र बीत जायेगी इन्हें गिनाने में
बड़ा मज़ा आता है तुझे मनाने में....

Saturday, July 19, 2014

आसमां से क्या बोलें

हर सितारा  गर्दिश  में
फिर आसमां से क्या बोलें
कलियों का चमन भी मुरझाया
फिर बागबां से क्या बोलें
भीड़ यहां इंसानो की
पर हर इंसान अकेला है
शोर जहां से आता है
वो तन्हाई का मेला है
तन्हा तुम हो तन्हा मैं हूँ
फिर कारवां से क्या बोलें





Saturday, July 12, 2014

मेरे देश की माटी

कौन कहता है मेरे देश की माटी चुप रहती है
जब जब इसकी गोद में लेटा, सब कुछ कहती है।
कहती है सुन मेरे बेटे, लाज वतन की रख लेना
क़र्ज़ दूध का बाकी है तुम,  मान वतन की रख लेना
मत भूल  जाना मेरे बच्चे, मेरे उन वीर जवानों को
 जान लुटा कर हसने वाले, अलबेलो मस्तानों को


Friday, July 11, 2014

यार का आना बाकी है

मेरा जनाज़ा रोक लो यारो
सजन मनाना बाकी है
कैसे खुदा के दर पे जाऊं
यार का आना बाकी है… मेरा जनाज़ा रोक लो यारो
दिलबर रूठा दिल भर रोया
आँसू भी संग छोड़ चले
कैसे बिछड़ा यार मनाऊं
अब कोई ना ज़ोर चले 
जिस रस्ते मेरा दिलबर गुज़रे
वहाँ नज़रे बिछाना बाकी है … मेरा जनाज़ा रोक लो यारो



Thursday, July 10, 2014

भारत माँ की संतानो

भारत माँ की संतानो
फ़र्ज़ तो अपना पहचानो
माँ की लाज  खतरे में पड़ी है
दुश्मन की फिर फौज खड़ी है
नए फिरंगी आबाद हो गए
सभी जानवर आज़ाद हो गए
कहाँ से लाएं भगत सिंह को
सुभाष चन्दर की आज़ाद हिन्द को
पंज प्यारो की फ़ौज कहाँ है
सरफ़रोशी की मौज कहाँ है
होश करो क़ुछ करने की ठानो …........... फ़र्ज़ तो अपना पहचानो


मैं और मेरा साया

एक मैं और एक मेरा साया
साथ हमेशा रहे मगर हम
ना मैं उसको समझा
ना वो मुझे समझ पाया .... एक मैं और एक मेरा साया


मैं हँस दूँ  तो वो भी हँस दे
मैं रोऊँ तो रो दे 
मेरे गम की सुन के कहानी
चैन वो अपना खो दे
पर हाथ कभी तो थामना चाहा
हाथ कभी ना आया .... एक मैं और एक मेरा साया



 

Sunday, July 6, 2014

दिल दीवाना



हमने सदियाँ  लगा दी जिसे बनाने में
तुमने पल भी ना लगाया उसे चुराने में
ये दिल बे कितना बेगाना निकला
दर्द भी ना हुआ इस को , इधऱ  से उधर जाने में.
जाम पीता है हर गम, ये सुना था मगर
साक़ी को  बड़े गौर से चुना था मगर
जा कर  कह दो कोई कि झूठे है सभी 
तमाम उम्र गुज़ारी हमने मयख़ाने में





Sunday, June 29, 2014

तुम

मेरे ख्वाबों की दुनिया का, चमकता एक तारा तुम
 मन की प्यासी मरुभूमि, में अमृत की हो धारा तुम
 मेरी विनती तुम्ही से है, मेरी दुनिया मेरा जीवन
 नहीं कुछ बाकी मुझमे है, अगर कर लो किनारा तुम।
नहीं मैं खुद में रह पाऊं , नहीं तुम तुम में रह पाओ
नहीं मैं कुछ भी कह पाऊं , नहीं तुम कुछ भी कह पाओ
चलो सिमटे कहीं चल कर किसी फिर ऐसी दुनिया में
जहाँ जो तेरा मेरा हो, उसे कर दो हमारा तुम। 
भटकता एक राही हूँ , तेरी मंजिल की राहों का
तरसता एक फरयादी, तेरी बाहों निगाहों का
यही इक शूल मन में है , कहीं ऐसा ना.. हो जाए
इधर आँखे मूंदे मेरी, उधर कर दो इशारा तुम।
जो यादो में समाये ना, उसे तो भूलना अच्छा
जो दिल को याद आये ना, उसे तो भूलना अच्छा
पर कैसे भुल सकते हो मेरी जाना.. वो हर लम्हा
वो पास आना वो शर्माना...गले लगना तुम्हारा तुम

तुम



Tuesday, April 22, 2014

पुर्ज़ा पुर्ज़ा मन हुआ

पुर्ज़ा पुर्ज़ा मन हुआ
मैला फिर दामन हुआ
मासूम थी  वो लाड़ली  किसी माँ बाप की 
एक सितारा आसमां  में दफ़न हुआ
पुर्ज़ा पुर्ज़ा मन हुआ
वो जो बैठे है सत्ता के मुहाने पर 
वो जो खुश है औरो को सताने पर
जख्म पर नमक छिड़कने वालो
क्या कभी जख्मी खुद का भी तन हुआ 
 पुर्ज़ा पुर्ज़ा मन हुआ
तुमसे हिसाब लेने की
ताक़त तो नहीं मुझमे
मेरे पीछे भी मज़मा हो
ये शोहरत तो नहीं मुझमे
पर सितमगर . . ये ख़बर रखना
पतंगा हूँ.. सब्र रखना
क़ुरबानी फ़ितरत में आ ही जाती है
गर मुश्किल में मेरा वतन हुआ
पुर्ज़ा पुर्ज़ा मन हुआ