Wednesday, January 15, 2020

कामवाली--एक लघुकथा

भाई, माँ कुछ दिनों के लिए तुम्हारे पास आना चाहती है. कहती है रज्जू से मिले बहुत दिन हो गए है...
अरे सुनील, लगता है माँ का दिमाग बुढापे में खराब हो गया है. उनको पता तो है कि आजकल रज्जू के पेपर चल रहे है. फिर भी...नहीं सुनील, तुम जो मर्ज़ी बहाना लगा दो पर माँ को अभी अपने पास ही रखो..
भाई पर.....
पर वर कुछ नहीं. तुम्हे तो पता है ना कि रज्जू की पढ़ाई के लिए हम कितने चिंतित है. ठीक है..बाकी बाते फिर कभी..माँ को तुम संभाल लो..जो मर्ज़ी बहाना बना दो..ओके बाय ..रखता हु फ़ोन..
फ़ोन की बीप काफी देर तक उसके कानो में बजती रही....
हेल्लो सुनील,,
हाँ भाई..कैसे हो
अरे सुनील, माँ को इधर भेज देना कुछ दिनों के लिए..
वो तो ठीक है भाई...पर अभी तो रज्जू के पेपर चल रहे होंगे....
सुनील..क्या है कि आजकल तुम्हारी भाभी की तबियत ठीक नहीं है..डॉक्टर ने काम के लिए मना किया है.. माँ आ जायेगी तो तुम्हारी भाभी जल्दी ठीक हो जायेगी...और रज्जू भी ठीक ढंग से पढ़ लेगा..तुम कल ही माँ को भेज देना..
फ़ोन अब भी बंद हो गया था..पर अब उसके कानो में बीप की आवाज़ नहीं आ रही थी..क्योंकि उसका ध्यान तो उस माँ की तरफ था जो सब कुछ सुन समझ कर अपने कपडे पैक करने में लग गई थी...रज्जू से मिलना जो था..चाहे कामवाली बन कर ही सही...

यारो मैंने छोड़ दिया

अच्छा कहलाना जाने कब से, यारो मैंने छोड़ दिया
दुनिया को दिल दे डाला था, दुनिया ने ही तोड़ दिया।।।

Tuesday, January 14, 2020

gaanv ka makaan

गाँव का कड़ियों वाला मकान,
बहुत याद आता है...
दूर तक फैला तारो वाला आसमान,
बहुत याद आता है...
बादल भी बड़ा अजीब चित्रकार था,
कभी घोडा, कभी बन्दर कभी श्वान,
बहुत याद आता है....
मुंह फुलाए बैठी रहती है शहर की कोठी
हँसता खिलखिलाता गले लगाता कच्चा मकान,
बहुत याद आता है....
दिखावे की जिंदगी ने कैद कर दिया शहर में
खेतों खलिहानों में उड़ते थे ऊँची उड़ान,
बहुत याद आता है....
दादी के चरखे को चला देना बिना मतलब
और दादी का फिर कहना कि हट शैतान,
बहुत याद आता है....

व्यापार

बस इतना सा हमने व्यापार किया है।
चंद खुशियाँ को खुद से उधार लिया है।
लम्हो से इजाज़त लेकर नवीन
होंठो पे हंसी का श्रृंगार किया है।।

व्यापार

बस इतना सा हमने व्यापार किया है।
चंद खुशियाँ को खुद से उधार लिया है।
लम्हो से इजाज़त लेकर नवीन
होंठो पे हंसी का श्रृंगार किया है।।

Monday, January 13, 2020

पल फुर्सत के

फुर्सत के कुछ पल निकले है,
उंगली पकड़ के चल निकले है
ढूंढ लो उनको मिल जाएंगे
आज नही वो कल निकले है

Saturday, January 4, 2020

भारती की लाज

एक भारत की भारती,
करती करुण पुकार।
वहसी राक्षस इधर उधर
वो बीच खड़ी मझदार।
कहाँ गया अब कान्हा प्यारा
जो राखे द्रोपदी लाज,
क्या नज़रें क्या शब्दबाण
सब बींधे मनवा पार।
दुनिया को जनने वाली
डरती दुनिया में आने से
इंसानो की दुनिया में
इंसानियत भी शर्मसार।

Thursday, January 2, 2020

व्यापार

बस इतना सा हमने व्यापार किया है।
चंद खुशियाँ को खुद से उधार लिया है।
लम्हो से इजाज़त लेकर नवीन
होंठो पे हंसी का श्रृंगार किया है।।