Thursday, November 20, 2025

वीर रस का कवि

वीर रस का कवि बनूं मै, ये सोचा था,
वेट छियालिस किलो था पर, ये लोचा था।


ये लोचा था, सोच सोच कर मन भरमाया,
दूध दही, घी, शर्बत मैंने खूब आजमाया,


खूब आजमाए बादाम छुहारे सेब और मावा
वेट छियालिस किलो से पर बढ़ ना पाया।


थक कर हुआ निढाल, मगर यूं हार ना मानी,
चढ़ सटेज पर गुराऊं, मैंने भी ठानी।


किस्मत ने भी साथ निभाया मेरे मन का,
काव्य मंच का संचालक था सखा बचपन का,


देकर माइक हाथ मुझे यूँ मंच चढ़ाया,
जय बजरंग बली का नारा साथ लगाया।


पर देख भीड़ का जोश, पसीना इतना फूटा,
तन बदन था गीला, माइक हाथ से छूटा,


थर थर कांप रहा था, खुद को कोस रहा था,
मुझसे न हो पायेगा क्यों नही होश रहा था।


पर अब पछताए क्या होगा, कुछ करना होगा,
पिछले जन्म का किया धरा, कुछ भरना होगा।


आगे पीछे ऊपर नीचे, भीड़ थी भारी,
कोई बजाए सीटी, किसी ने आंख थी मारी


मरीज़ कहां से आया, भीड़ से कोई बोला,
पीछे हूटिंग कर रहा, मुस्टंडों का टोला।


इतने में माहौल भीड़ का बदला सारा,
किसी का चेहरा लाल, किसी का चढ़ा था पारा


कोई मारे शर्म सीट में धंस रहा था,
कोई अपना पेट पकड़ कर हंस रहा था।


खूब हुआ हैरान माजरा समझ न आया,
तभी किसी ने आके कान में फुसफुसाया।


किसने कहा था तुमको मंच पर करो चढ़ाई
जाकर बदलो पेंट तुम्हारी गीली है भाई।


इतना सुनते जाने कहाँ से ताकत आई
हनुमान की भाँति मंच से कूद लगाई

सरपट भागे घर हाथ कानो पे लगाए

आगे से दुश्मन को भी न कोई मंच चढ़ाए।
आगे से दुश्मन को भी न कोई मंच चढ़ाए।

सारा मेरा हौंसला टूटा,
गला हो गया शुष्क, पसीना टपक रहा था,

Saturday, September 27, 2025

तुम्हे क्या

झूठे ही सही, बचपन में लौट जाऊं, तुम्हे क्या
खुद से ही रूठ जाऊं और खुद को ही मनाऊं, तुम्हे क्या

Friday, August 22, 2025

रिटायरमेंट 2

हुए रिटायर चलो ये माना 
अभी रवानी मगर है बाकी
अभी पुराना सफर है बीता
अभी सुहाना सफर है बाकी

वो मस्तियों का ही दौर होगा
नहीं रहेगी कोई भी टेंशन 
शुक्र खुदा का कि हर महीने
आयेगी खाते में एक पेंशन 
करेंगे सजदा हर एक दर पर
अभी तलक जो भी दर है बाकी...हुए रिटायर चलो ये माना 

Tuesday, August 19, 2025

भारत के लाल

इस भारत की भूमि पर
कायर आंसू न टपकाना
ये खून मांगती बलिदान का
हिम्मत हो तो आ जाना

Monday, August 4, 2025

फिजिकल फाइलों वाले दिन

याद बहुत आते हैं फिजिकल फाइलों वाले दिन
मैन्युअल था हर काम मगर थे समाईलों वाले दिन 

अब तो एक सी सबकी लिखावट खो गई है कलाकारी छोटी आई के ऊपर थे लगाते हम बिंदी बड़ी भारी
जलेबी जैसे सिग्नेचर के स्टाइलों वाले दिन

E office तो बहुत ही बढ़िया पर एक है मजबूरी
कैंटीन बैठ भी निपटाते जो फाइल बहुत जरूरी
अरे कैसे आए OTP मोबाइलों वाले दिन

रंग-बिरंगे फ्लैग से सज कर फाइल लगती थी न्यारी 
एक एक टैग में कई कई कागज घायल उंगली थी सारी
ना चिपकू हर फ्लैग को भी चिपकाएलो वाले दिन
 


Saturday, July 26, 2025

Retirement रिटायरमेंट guleria maama

प्रमोशन रिटायरमेंट सरकारी कहानी है 
Retirement nahi kuchh bas ek sarkari kahani hai
Ghar ki jimmedari bhi to hamne sb nibhani hai...
Abhi to saath guzre hai abhi ek umar baaki hai
Khatam office ki sb baate ab aage jindgani hai....

कहीं है दौर खुशियों का कहीं आंखों में पानी है 
अभी तो साठ गुजरे हैं अभी एक उम्र बाकी है 
खत्म फाइल के सब झंझट अब आगे जिंदगानी है। 

बिछड़ना तो मुकद्दर पर, घड़ी मुश्किल की है लेकिन लिखावट होगी सरकारी, कलम तो दिल की है लेकिन 
नहीं हम भूल पाएंगे कभी भी आपको देखो
यहां का जर्रा जर्रा आपकी मेहनत निशानी है

Hamne dekha sda hi aap rahe the daudte bhage
Sun kar gum hamaare aap, roye raat bhar jaage.
Ghar ke jo bade hote yahi unki kahaani hai
Labo par muskurahat hai magar aankho me paani hai....




Tuesday, April 8, 2025

बदौलत मयखाना है

दम भरते रहे उम्र भर
कि मेहनतकश तबियत है
नहीं मालूम था कि दम
बदौलत मयखाना है

मेरे मरने का हर सामान
इस दुनिया ने तो जोड़ा है
मगर जिंदा है अब तक हम 
बदौलत मयखाना है

Wo insaano ki basti me 
Agar mil jaaye to pakka
Jo raunak hai wo raunak bhi
Badolat maykhana hai...