एक ऐसी रंगोली दे भगवन,
वो हंसी ठिठोली दे भगवन,
किलकाता हर मन हो ऐसी
बचपन टोली दे भगवन।।
क्यों बचपन कूड़ा बीन रहा
ये कैसा धर्म और दीन रहा
कोई सोता है वो रोता है,
जब भूख से व्याकुल होता है
वो ओढ़नी जिसमें दूध मिले,
हर सर वो चोली दे भगवन।
एक ऐसी रंगोली दे भगवन।।
सुनते है आज दिवाली है,
पर उसका पेट क्यों खाली है।
उम्मीदों भूख का पहरा है,
हर सपना ठहरा ठहरा है,
सपनों में उम्मीद का रंग भरे
बस ऐसी होली दे भगवन।।
एक ऐसी रंगोली दे भगवन।।