Wednesday, May 27, 2015

कौन शहर ले आये बापू..

सर्द आंगन में धूप गांव की, थपकी दे दे सुलाती है,

कौन शहर ले आये बापू.. चांदनी भी झुलसाती है।

बाबुल की देहरी लांघ के मैया
घर ससुराल के आ बैठी
अपना सब कुछ छोड़ के बाबा
सबको अपना बना बैठी
यूँ तो कोई कमी नहीं पर
आँख कभी भर आती है।
कोन शहर ले आये बापू 
चांदनी भी झुलसाती है।।।
ये सड़के लंबी चौड़ी जाने, कौन जहां को जाती है।
ना कोई है मंज़िल इनकी, पर सारा दिन दौड़ाती है।
उलझ गई किस भूल भुलैया... ये कैसा जंजाल है
हाथ पकड़ कर घर ले जाती.. पगडण्डी याद आती है।।
कौन शहर ले आये बापू..चांदनी भी झुलसाती है।।।
बारिस की बुँदे माटी में रुंध कर 
खुशबू ऐसी महकाती थी...
बचपन से हाथ छुड़ा मैं अपने,
यौवन घर आ जाती थी...
यहाँ आग उगलती फिजा भी है तो,
बेमौसम बरसाती है,,
कोन शहर ले आये बापू,
चांदनी भी झुलसाती है....




Wednesday, May 20, 2015

कुछ आंसुओ में निकले

कुछ आंसुओ में निकले, कुछ कागज़ उतर गए
जज्बात मेरे मन के, यूँही बिखर गए...

इन आंधियो ने कहाँ, लूटा चमन को था

वो बागबाँ थे इसके, जो ढा कर कहर गए ..

जो उड़ते फिर रहे थे, खुले आसमान में
अरमान के परिंदे, थक कर ठहर गए...


दोराहे पर जो आ के , मेरी जिन्दगी रुकी
दामन झटक नई राह, मेरे हमसफ़र गए...

Wednesday, May 6, 2015

दुनिया री दुनिया..

अजब देखी ये दुनिया भी, अजब इसकी कहानी है,
कहीं सीने में खंजर है, कहीं आँखों में पानी है..
तरसती माँ की ममता है, बड़ी व्याकुल जवानी है.
चंद कागज़ के टुकडो पर, रिश्तो की कुर्बानी है,,
अजब देखी ये दुनिया भी, अजब इसकी कहानी है।
जिसको कोख में पाला, लात उसकी ही खाई है
लब पे फिर भी दुआएं है, अजब ममता की जाइ है
 जिसको चलना सिखाया था, वो चल के चला गया कहीं दूर
उसकी एक झलक तरसे, बूढी आँखे ये मजबूर
वो इस पर यकीन करे कैसे, जो सुनते श्रवण कहानी है।
अजब देखी ये दुनिया भी, अजब इसकी कहानी है।।