Saturday, September 12, 2020

मयस्सर भी कहां होती है रोटी इस जमाने में

मयस्सर भी कहां होती है रोटी इस जमाने में
किसी की जान निकलती है निवाले दो कमाने में
आज निकले पसीने से फटा वो नोट भी आखिर
कमाया था गला कर जिस्म जो कल के मेहनताने में।।।

होती नींद है छोटी वो छोटी भी जरूरी है,
कि भूखे पेट बच्चों को तो रोटी ही जरूरी है
नहीं अब वो बहलते हैं किसी लोरी के गाने में।।

हाकिम ने कहा था हम गरीबी को मिटा देंगे,
तेरे हर एक सपने को हक़ीक़त कर दिखा देंगे
मिटे कितने मगर सपने उसके झूठे फसाने में।।।

तुझे है शौक सुनने का, तो सुनले ओ महल वाले
महल तेरे की ही खातिर, है इसके पांव में छाले
लहू इसने बहाया है तेरी दुनिया बनाने में।।।।

सुना था एक होता है, कहीं भगवान ऊपर भी
सुनता हर कोई फरियाद, कहीं भगवान ऊपर भी,
मगर बेबस है वो कितना, इसे भी हक़ दिलाने में।।।।


गुजरती उम्र उसकी है किसी का महल बनाने में।।।।

Sunday, June 14, 2020

गमले का फूल


बड़े जतन से आंगन मैंने.....
फूल कोई एक पाला था।।।
पानी और कुछ खाद सहारा
जाने कैसे संभाला था।।
एक दिन उससे कुछ बात हुई....
यूँ छोटी सी मुलाकात हुई...
कुछ उसके गहरे सवाल भी थे
आंखों सपनो के जाल भी थे।।
गमले में मुझको रोका है?
क्यो मुझसे किया ये धोखा है...
मैं भले खिला सा दिखता हूँ...
पर भीतर भीतर रिसता हूँ।।।
यहां तितली कोई नही आती...
कोयल भी गीत नही गाती...
मुझ पर तो छाई उदासी है...
क्यों कैद में जंगल वासी है...
ये सुन कर मैं भी चकराया
फिर मैंने उसको समझाया..
झूठे सपनो को नही बोते..
अब जंगल यहाँ नही होते
ये जंगल हम सब काट चुके
धरती आपस में बाँट चुके
अब धरती खोज न पाओगे
तुम रोते ही रह जाओगे
काहे खुद पे शर्मिंदा हो
खुश रहो कि अब तक जिंदा हो
खुश रहो कि अब तक जिंदा हो........

Wednesday, May 6, 2020

जिंदगी गुजार दें

पल भर की है जिंदगी, हम पल पल को संवार दे
जिंदगी के वास्ते, कई जिंदगी गुजार दें।।
आँखे गम से नम हो गर तो, फिर जीना क्या जीना है,
एक दूजे के आंसुओं पे, पहरे हम हज़ार दें।।
अगर तिज़ारत बहुत जरूरी, तो फिर इतनी तिज़ारत हो,
नफरत भी गर कभी मिले तो, बस बदले में प्यार दें।।
नंगे बदन बालक का चेहरा, देख खिलौना मुस्काया,
ऐसी एक मुस्कान पे अपनी, दौलत सब निसार दें।।
ख़ंजर के ज़ख्मो से गहरे, कड़वी बातों के घाव बहुत,
मीठे बोल सदा निकले वो, वाणी को रस धार दें।

Thursday, April 9, 2020

बचपन

यादों आकर मुझपे इतना, करम फक्त फरमाना तुम,
हाथ पकड़ कर मेरा मुझको बचपन मे ले जाना तुम।
देखो तुम भी भूल न जाना, बचपन बड़ा सुहाना था,
खुली छत्तो पर पतंग का मेला, और कंचो का ताना था

Wednesday, January 15, 2020

कामवाली--एक लघुकथा

भाई, माँ कुछ दिनों के लिए तुम्हारे पास आना चाहती है. कहती है रज्जू से मिले बहुत दिन हो गए है...
अरे सुनील, लगता है माँ का दिमाग बुढापे में खराब हो गया है. उनको पता तो है कि आजकल रज्जू के पेपर चल रहे है. फिर भी...नहीं सुनील, तुम जो मर्ज़ी बहाना लगा दो पर माँ को अभी अपने पास ही रखो..
भाई पर.....
पर वर कुछ नहीं. तुम्हे तो पता है ना कि रज्जू की पढ़ाई के लिए हम कितने चिंतित है. ठीक है..बाकी बाते फिर कभी..माँ को तुम संभाल लो..जो मर्ज़ी बहाना बना दो..ओके बाय ..रखता हु फ़ोन..
फ़ोन की बीप काफी देर तक उसके कानो में बजती रही....
हेल्लो सुनील,,
हाँ भाई..कैसे हो
अरे सुनील, माँ को इधर भेज देना कुछ दिनों के लिए..
वो तो ठीक है भाई...पर अभी तो रज्जू के पेपर चल रहे होंगे....
सुनील..क्या है कि आजकल तुम्हारी भाभी की तबियत ठीक नहीं है..डॉक्टर ने काम के लिए मना किया है.. माँ आ जायेगी तो तुम्हारी भाभी जल्दी ठीक हो जायेगी...और रज्जू भी ठीक ढंग से पढ़ लेगा..तुम कल ही माँ को भेज देना..
फ़ोन अब भी बंद हो गया था..पर अब उसके कानो में बीप की आवाज़ नहीं आ रही थी..क्योंकि उसका ध्यान तो उस माँ की तरफ था जो सब कुछ सुन समझ कर अपने कपडे पैक करने में लग गई थी...रज्जू से मिलना जो था..चाहे कामवाली बन कर ही सही...

यारो मैंने छोड़ दिया

अच्छा कहलाना जाने कब से, यारो मैंने छोड़ दिया
दुनिया को दिल दे डाला था, दुनिया ने ही तोड़ दिया।।।