किसी की जान निकलती है निवाले दो कमाने में
आज निकले पसीने से फटा वो नोट भी आखिर
कमाया था गला कर जिस्म जो कल के मेहनताने में।।।
होती नींद है छोटी वो छोटी भी जरूरी है,
कि भूखे पेट बच्चों को तो रोटी ही जरूरी है
नहीं अब वो बहलते हैं किसी लोरी के गाने में।।
हाकिम ने कहा था हम गरीबी को मिटा देंगे,
तेरे हर एक सपने को हक़ीक़त कर दिखा देंगे
मिटे कितने मगर सपने उसके झूठे फसाने में।।।
तुझे है शौक सुनने का, तो सुनले ओ महल वाले
महल तेरे की ही खातिर, है इसके पांव में छाले
लहू इसने बहाया है तेरी दुनिया बनाने में।।।।
सुना था एक होता है, कहीं भगवान ऊपर भी
सुनता हर कोई फरियाद, कहीं भगवान ऊपर भी,
मगर बेबस है वो कितना, इसे भी हक़ दिलाने में।।।।
गुजरती उम्र उसकी है किसी का महल बनाने में।।।।
No comments:
Post a Comment