तेरा ही बाशिंदा हूँ
धरती माँ शर्मिंदा हूँ
रिम झिम रिम झिम नीर गिरा
रूप देख खो जाता था मन
जीभ की खातिर इसने मारे
लालच इतना सब कुछ लूटा
फसलों में भी जहर को घोला
.......................हैरानी है कि जिन्दा हूँ
.......................धरती माँ शर्मिंदा हूँ
माना विकास जरुरी है
वर्ना जिन्दगी अधूरी है
और जीव और जन ना होंगे
रोगी रोगी हर तन होगा
हर एक जन एक वृक्ष लगाए
जीने का हक रखते सारे
धरती को दुल्हन सा सजाये
धरती माँ शर्मिंदा हूँ
घुमड़ घुमड़ इतराते थे बादलहरियाली का था तेरा ओढ़ना
नदिया थी तेरी रक़त शिरा
रिम झिम रिम झिम नीर गिरा
पर्वतो की लम्बी मालाहरे भरे और सुन्दर वन
सदा से तेरा ढकते थे तन
रूप देख खो जाता था मन
पशु पक्षी और जंतु सारेपर मानव ने क्या कर डाला
फाड दिया तेरा हरा दुशाला
जीभ की खातिर इसने मारे
गैस तेल जो कुछ भी फूटाविकास के नाम का ओढ के चोला
गर्भ को तेरे खूब टटोला
लालच इतना सब कुछ लूटा
लालच में यू मन क्या डोलाजीव जंतु चुन चुन के मारे
काट दिए वन उपवन सारे
फसलों में भी जहर को घोला
.......................हैरानी है कि जिन्दा हूँ
.......................धरती माँ शर्मिंदा हूँ
माना विकास जरुरी है
वर्ना जिन्दगी अधूरी है
क्या होगा जब वन ना होंगेपर कुछ सोच भी करनी होगी
वर्ना कीमत भरनी होगी
और जीव और जन ना होंगे
वो जीवन क्या जीवन होगावायु इतनी दूषित होगी
जनता सारी कुपोषित होगी
रोगी रोगी हर तन होगा
धरती को हम फिर से सजायेनहीं नहीं अब तो जागो
जिम्मेदारी से न भागो
हर एक जन एक वृक्ष लगाए
जीव जंतु है मित्र हमारेनहीं करे बर्बाद फ़िज़ूल ही
पानी तेल या घर कि बिजली
जीने का हक रखते सारे
प्रकृति को हम अपनाएअभी भी इतनी देर नहीं है
शाम हुई अंधेर नहीं है
धरती को दुल्हन सा सजाये
फिर ना कभी मुह से निकले
कि धरती माँ शर्मिंदा हूँ
कि धरती माँ शर्मिंदा हूँ
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