Saturday, July 28, 2012

धरती माँ

तेरा ही बाशिंदा हूँ
धरती माँ शर्मिंदा हूँ
हरियाली का था तेरा ओढ़ना
नदिया थी तेरी रक़त शिरा
घुमड़ घुमड़ इतराते थे बादल
रिम झिम रिम झिम नीर गिरा
हरे भरे और सुन्दर वन
सदा से तेरा ढकते थे तन
पर्वतो की लम्बी माला
रूप देख खो जाता था मन
पर मानव ने क्या कर डाला
फाड दिया तेरा हरा दुशाला
पशु पक्षी और जंतु सारे
जीभ की खातिर इसने मारे
विकास के नाम का ओढ के चोला
गर्भ को तेरे खूब टटोला
गैस तेल जो कुछ भी फूटा
लालच इतना सब कुछ लूटा
जीव जंतु चुन चुन के मारे
काट दिए वन उपवन सारे
लालच में  यू मन क्या डोला
फसलों में भी जहर को घोला
.......................हैरानी है कि जिन्दा हूँ
.......................धरती माँ शर्मिंदा हूँ
माना विकास जरुरी है
वर्ना जिन्दगी अधूरी है
पर कुछ सोच भी करनी होगी
वर्ना कीमत भरनी होगी
क्या होगा जब वन ना होंगे
और जीव और जन ना होंगे
वायु इतनी दूषित होगी
जनता सारी कुपोषित होगी
वो जीवन क्या जीवन होगा
रोगी रोगी हर तन होगा
नहीं नहीं अब तो जागो
जिम्मेदारी से न भागो
धरती को हम फिर से सजाये
हर एक जन एक वृक्ष लगाए
नहीं करे बर्बाद फ़िज़ूल ही
पानी तेल या घर कि बिजली
जीव जंतु है मित्र हमारे
जीने का हक रखते सारे
अभी भी इतनी देर नहीं है
शाम हुई अंधेर नहीं है
प्रकृति को हम अपनाए
धरती को दुल्हन सा सजाये
फिर ना कभी मुह से निकले
कि धरती माँ शर्मिंदा हूँ
कि धरती माँ शर्मिंदा हूँ

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