वो इठलाता, मुस्कुराता, दौड़ कर गले लग जाता है....
मुझे देख कर वो, बस फुला नही समाता है।
और मुहं फुलाए बैठी रहती हैं तुम्हारे शहर की कोठियां.....
मेरे गांव के घर का मुझसे, कुछ अलग ही नाता है।।।
वो कहते है मुझसे
कि घर बेच दूँ
वो बगिया वो अंगना ..डगर बेच दूँ
कोई बतलाये मुझको ....जिऊँगा मैं कैसे
जिन्दगी को अपनी अगर बेच दूँ ...
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ
कि घर बेच दूँ
वो बगिया वो अंगना ..डगर बेच दूँ
कोई बतलाये मुझको ....जिऊँगा मैं कैसे
जिन्दगी को अपनी अगर बेच दूँ ...
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ
नहीं है ये घर ...ईंट गारे का घर
बचपन के सपनों का ......है ये नगर
कंचे का ताना ...लुका छिप्पी की बारी
वो गुल्ली और डंडा फिर किश्ती की सवारी
कैसे सपनो का सागर .....सगर बेच दूँ
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ
बाबा की लाठी की हुई है खट्खट
भागूं मैं दोस्त , कंचे समेटो फटाफट
कहाँ पे कलम है कहाँ है किताबे
कहाँ पे है बस्ता,,माँ ज़रा तू बतादे
बाबा से मुझको बस लगता है डर
कैसे बाबा से लगता, वो..... डर बेच दूँ
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ
वो दादी वो बुआ वो चाची वो ताई
कभी याद मुझको माँ की ना आई
नहीं है अब भूख बिलकुल भी मैया
चाची ने मुझको है लस्सी पिलाई
मक्की की रोटी दादी ने खिला दी
बुआ ने सिलबट्टे की चटनी खिलाई
नहीं है अब भूख बिलकुल भी मैया
चाची ने मुझको है लस्सी पिलाई
मक्की की रोटी दादी ने खिला दी
बुआ ने सिलबट्टे की चटनी खिलाई
ममता की भर भर के मिलती थी गागर
कैसे ममता की सारी गागर बेच दूँ
कैसे ममता की सारी गागर बेच दूँ
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ
वो बगिया वो अंगना ..डगर बेच दूँ
कोई बतलाये मुझको ....जिऊँगा मैं कैसे
जिन्दगी को अपनी अगर बेच दूँ ...
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ
कोई बतलाये मुझको ....जिऊँगा मैं कैसे
जिन्दगी को अपनी अगर बेच दूँ ...
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ
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