वक़्त के स्याह कागज़ पर
मैंने जिन्दगी की कलम से
कुछ अक्स उतारे है..तुम्हारे तो नहीं..
सिमट गयी है चांदनी
अँधेरे से डर गयी
ये रौशनी के जो नज़ारे है..तुम्हारे तो नहीं...
मैंने जिन्दगी की कलम से
कुछ अक्स उतारे है..तुम्हारे तो नहीं..
सर्दी की गर्म रातो में
आसमां की चादर में
जितने हसीं तारे है..तुम्हारे तो नहीं..
सिमट गयी है चांदनी
अँधेरे से डर गयी
ये रौशनी के जो नज़ारे है..तुम्हारे तो नहीं...
खुश्क हुआ था कबसे
ये दरिया तो मगर
आज अश्को के धारे हैं ...तुम्हारे तो नहीं...
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