Sunday, July 6, 2014

दिल दीवाना



हमने सदियाँ  लगा दी जिसे बनाने में
तुमने पल भी ना लगाया उसे चुराने में
ये दिल बे कितना बेगाना निकला
दर्द भी ना हुआ इस को , इधऱ  से उधर जाने में.
जाम पीता है हर गम, ये सुना था मगर
साक़ी को  बड़े गौर से चुना था मगर
जा कर  कह दो कोई कि झूठे है सभी 
तमाम उम्र गुज़ारी हमने मयख़ाने में





Sunday, June 29, 2014

तुम

मेरे ख्वाबों की दुनिया का, चमकता एक तारा तुम
 मन की प्यासी मरुभूमि, में अमृत की हो धारा तुम
 मेरी विनती तुम्ही से है, मेरी दुनिया मेरा जीवन
 नहीं कुछ बाकी मुझमे है, अगर कर लो किनारा तुम।
नहीं मैं खुद में रह पाऊं , नहीं तुम तुम में रह पाओ
नहीं मैं कुछ भी कह पाऊं , नहीं तुम कुछ भी कह पाओ
चलो सिमटे कहीं चल कर किसी फिर ऐसी दुनिया में
जहाँ जो तेरा मेरा हो, उसे कर दो हमारा तुम। 
भटकता एक राही हूँ , तेरी मंजिल की राहों का
तरसता एक फरयादी, तेरी बाहों निगाहों का
यही इक शूल मन में है , कहीं ऐसा ना.. हो जाए
इधर आँखे मूंदे मेरी, उधर कर दो इशारा तुम।
जो यादो में समाये ना, उसे तो भूलना अच्छा
जो दिल को याद आये ना, उसे तो भूलना अच्छा
पर कैसे भुल सकते हो मेरी जाना.. वो हर लम्हा
वो पास आना वो शर्माना...गले लगना तुम्हारा तुम

तुम



Tuesday, April 22, 2014

पुर्ज़ा पुर्ज़ा मन हुआ

पुर्ज़ा पुर्ज़ा मन हुआ
मैला फिर दामन हुआ
मासूम थी  वो लाड़ली  किसी माँ बाप की 
एक सितारा आसमां  में दफ़न हुआ
पुर्ज़ा पुर्ज़ा मन हुआ
वो जो बैठे है सत्ता के मुहाने पर 
वो जो खुश है औरो को सताने पर
जख्म पर नमक छिड़कने वालो
क्या कभी जख्मी खुद का भी तन हुआ 
 पुर्ज़ा पुर्ज़ा मन हुआ
तुमसे हिसाब लेने की
ताक़त तो नहीं मुझमे
मेरे पीछे भी मज़मा हो
ये शोहरत तो नहीं मुझमे
पर सितमगर . . ये ख़बर रखना
पतंगा हूँ.. सब्र रखना
क़ुरबानी फ़ितरत में आ ही जाती है
गर मुश्किल में मेरा वतन हुआ
पुर्ज़ा पुर्ज़ा मन हुआ


Saturday, November 2, 2013

पाती प्रेम भरी

चाहता हूँ तुम्हे प्रेषित
करना पाती प्रेम भरी
कुछ हृदय के हाल बयाँ है
कुछ शब्दो की जादूगरी

प्रिये तुम बिन घर है सूना
सूना कमरा सूनी गलियां
जुल्फों में लगने को कायल
कारी पड़ गयी
गज़रे की कलियाँ
मन के तपते रेगिस्तां में
आवो बन के सावन की झरी 
चाहता हूँ तुम्हे प्रेषित
करना पाती प्रेम भरी .... 

अपने आप से बतियाता हूँ
सब पगला मुझे माने हैं
प्रेम रोग से गर्सित हूँ पर
वो नादाँ कहाँ जाने हैं
मुझे देख मोरे निकट ना आवे
कैसी विपदा आन परी
चाहता हूँ तुम्हे प्रेषित
करना पाती प्रेम भरी ....

हर इक शख्स में अक्स तुम्हारा
जिस पर भी प्रिये नज़र परे
इसी चक्कर में शायद हमने
सखा के मुख पर अधर धरे
जो भी मेरे पास खड़ा हो
मैं तो समझु
तुम ही खरी
चाहता हूँ तुम्हे प्रेषित
करना पाती प्रेम भरी ....

अब तो प्रिये आन मिलो तुम
और ना हमको तरसावो
प्रेम अनल में पत्थर दिल को
थोरा सा तो पिघराओ
ख़त को प्रिये तार समझ कर
इस घर की पकड़ो डगरी
चाहता हूँ तुम्हे प्रेषित
करना पाती प्रेम भरी ....




Friday, January 25, 2013

अश्कों की नमी सी देखी है

तेरी आखों में मैंने कुछ
अश्कों की नमी सी देखी है
धुंधली ही सही कुछ तो मगर
यादे सिमटी देखी है
ख़ामोश है लब तो शिकवा क्या
बेवफा जुबां तो शिकवा क्या
इजहारे मोहब्बत हमने कातिल
नज़रों से होती देखी है
तेरी आखों में मैंने कुछ .......
तेरे बदन की खुश्बू को
मुठ्ठी में भर कर लाया हूँ 
तन्हाई में इससे अपनी
दुनिया महकती देखी है
तेरी आखों में मैंने कुछ .......
साथ मेरा तुम दोगी कब तक
ये बतलाना जरुरी नहीं
पलक झपकते ही हमने ये
दुनिया बदलती देखि है।
तेरी आखों में मैंने कुछ .......


Saturday, January 12, 2013

घर बेच दूँ ?


वो इठलाता, मुस्कुराता, दौड़ कर गले लग जाता है....
मुझे देख कर वो, बस फुला नही समाता है।
और मुहं फुलाए बैठी रहती हैं तुम्हारे शहर की कोठियां.....
मेरे गांव के घर का मुझसे, कुछ अलग ही नाता है।।।


वो कहते है मुझसे
कि घर बेच दूँ
वो बगिया वो अंगना ..डगर बेच दूँ
कोई बतलाये मुझको ....जिऊँगा मैं कैसे
जिन्दगी को अपनी अगर बेच दूँ ...
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ

नहीं है ये घर ...ईंट गारे का घर 
बचपन के सपनों का ......है ये नगर 
कंचे का ताना ...लुका छिप्पी की बारी 
वो गुल्ली और डंडा फिर किश्ती की सवारी 
कैसे सपनो का सागर .....सगर बेच दूँ 
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ

बाबा की लाठी की हुई है खट्खट
भागूं मैं दोस्त , कंचे समेटो फटाफट
कहाँ पे कलम है कहाँ है किताबे 
कहाँ पे है बस्ता,,माँ ज़रा तू बतादे
बाबा से मुझको बस लगता है डर 
कैसे बाबा से लगता, वो..... डर बेच दूँ 
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ  

वो दादी वो बुआ वो चाची वो ताई 
 कभी याद मुझको माँ की ना आई
नहीं है अब भूख बिलकुल भी मैया
चाची ने मुझको है लस्सी पिलाई
मक्की की रोटी दादी ने खिला दी 
बुआ ने सिलबट्टे की चटनी खिलाई
ममता की भर भर के मिलती थी गागर  
कैसे ममता की सारी गागर बेच दूँ 
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ  
वो बगिया वो अंगना ..डगर बेच दूँ
कोई बतलाये मुझको ....जिऊँगा मैं कैसे
जिन्दगी को अपनी अगर बेच दूँ ...
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ