Friday, February 27, 2015

सपनो को भी देखा है

सपनो को भी देखा है हकीक़त में बदलते हुए...
कभी घुटनों पे तो कभी ठुमक ठुमक चलते हुए...
कभी ज़िद करते हुए..और जमीं पर पसरते हुए..
तेरे अरमानो में ओ बेटी..मेरे अरमान मचलते हुए..
सपनो को भी देखा है...हकीकत में बदलते हुए....

Sunday, February 22, 2015

मेरे खुदा..

जिक्र चल रहा था अपने खुदाओ का मगर
मेरे लब से सनम का नाम निकल गया
दफ़न ये राज मेरे मन में था मगर
कमबख्त क्या हुआ कि पता शहर को चल गया..

Sunday, January 4, 2015

शहर अजनबी सा हो गया..

पता पूछता हूँ सबसे...
अपने घर का ही यारो
उसके दर से क्या उठा कि
शहर अजनबी सा हो गया..

ये वक़्त का तकाज़ा था
या फितरत का जनून जानी
जो मिलता था हर रोज़ सनम
वो कभी कभी सा हो गया।

रफ्ता रफ्ता उसको चाहा
रफ्ता रफ्ता दुनिया पलटी
जो होता था आसमान सा
अब वो भी जमीं सा हो गया।

कुछ तो जादू करते होगे
करामात नज़रों की होगी
शोला सा मन बावरा कैसे
अब शबनमी सा हो गया

जुल्फ रागिनी, बोल तरन्नुम
हंसी ग़ज़ल का मुखड़ा थी
एक पल का मिलना था लेकिन
मैं भी कवि सा हो गया।

एक जिन्दगी गुजारी है

हमने तो सदा दी थी,
अब बारी तुम्हारी है
और अब इंतज़ार कितना
एक जिन्दगी गुजारी है
हमने तो सदा दी थी........

तुम्हारे तो नहीं...??

वक़्त के स्याह कागज़ पर
मैंने जिन्दगी की कलम से
कुछ अक्स उतारे है..तुम्हारे तो नहीं..

सर्दी की गर्म रातो में
आसमां की चादर में
जितने हसीं तारे है..तुम्हारे तो नहीं..

सिमट गयी है चांदनी
अँधेरे से डर गयी
ये रौशनी के जो नज़ारे है..तुम्हारे तो नहीं...

खुश्क हुआ था कबसे
ये दरिया तो मगर
आज अश्को के धारे हैं ...तुम्हारे तो नहीं...

Thursday, December 25, 2014

अलविदा माँ अलविदा.....

माँ, ये मेरा पहला और आखिरी ख़त है तुमसे
इसके बाद ये बेटी तुमसे कुछ नहीं कह पाएगी
माँ, जब मेरे आने का एहसास तुम्हारे मन में आया था
माँ, जब तेरे गर्भ में मैंने अपना वजूद बनाया था
तब तुम्हारे मन में ममता की लहरें हिलोरी थी
और उस एहसास मात्र से ही तुमने कितनी खुशियां बटोरी थी
तुम पल छिन पल छिन गिना करती थी
तुम मेरे आने के सपने बुना करती थी
मुझे याद है माँ, जब मैं तेरी कोख में हिला करती थी
तुम्हे उस जानलेवा दर्द में भी कितनी ख़ुशी मिला करती थी
तेरी ममता की उस छाँव में माँ, मुझे कोई चिंता कोई फ़िक्र ना था
ना ही मुझे दुनिया की किसी बात का कोई डर था
मैं तेरी कोख में जो थी
परन्तु जैसे ही मेरा वजूद बेटी के रूप में ढला
माँ तुम बिलकुल बदल गई
तुम्हारे चेहरे पर रहने वाले खुशियों के बादल यकायक गायब हो गए
तुम्हारी ममता ने जब नफरत का रूप ले लिया, मुझे यकीं ही नहीं हुआ माँ
मैं हैरान और अवाक रह गई माँ, जब मुझे पता लगा कि
तुम मुझे दुनिया में लाने से पहले ही दुनिया से विदाई की तैयारी कर रही हो
सच में माँ, यकीं ही नहीं हुआ
बहुत चीखी बहुत चिल्लाई थी माँ
किस प्रकार वो चाक़ू छुरी मेरे अधबने जिस्म के टुकड़े टुकड़े कर रहे थे
पर तेरे चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी
हाँ, मुझसे छुटकारा पाने का एक संतोष जरुर था
माँ ये मेरा क़त्ल नहीं, ये एक ममता का क़त्ल था
मुझे दुनिया में तो आने देती माँ
मेरी काबिलियत दुनिया को तो दिखाने देती माँ
मैं भी कोई इंदिरा, कोई कल्पना बन सकती थी माँ
या फिर मदर टेरेसा बन कर तुम्हारा नाम रोशन कर सकती थी माँ
बेटो कि चाहत तो बुरी नहीं पर इतना तो सोचती माँ
अगर बेटिया ही नहीं रहेंगी तो कहाँ से होंगे बेटे भी
अंत में माँ, बस इतनी विनती है
कि किसी मासूम बेटी को कोख में मारने से पहले इतना जरुर सोचना
कि क़त्ल बेटी का नहीं, क़त्ल ममता का है, क़त्ल इंसानियत का है, क़त्ल पूरी प्रकृति का है....
अलविदा माँ अलविदा.....

तेरा मुझको कहीं नज़र आना..

मेरे दिल को सकून देता है, तेरा मुझको कहीं नज़र आना..
छुप छुप के तेरा शर्माना, शर्मा के फिर से छुप जाना ...
मेरे दिल को सकून देता है, तेरा........