सजा कर घर के कोनो को
आप कितना सताते हैं
हमें ना हुक्म हिलने का है
ना हम बैठ पाते है।।
भले ठहरे हम बुत लेकिन
हैं कुछ अरमान हमारे भी
बहती धार को ज्यों देख
मचल जाते किनारे भी
बढ़ कर थाम लें दामन
ये अरमा दिल में आते है
हमें ना हुक्म हिलने का है
ना हम बैठ पाते है।।
हमसे बेरुखी इतनी
नहीं अच्छी है जानो तुम
क़यामत सर हमारे है
मानो या ना मानो तुम
जिन्दा हैं कि छूते हो
भले आप धूल हटाते हैं
हमें ना हुक्म हिलने का है
ना हम बैठ पाते है।।
डर है कब सजावट तुम
इस कोने की बदल दोगी
हटा कर मुझे किसी सुंदर
नए बुत को पहल दोगी
जुदाई कबूल अगर आंसू
आपकी आँखों भी आते है
हमें ना हुक्म हिलने का है
ना हम बैठ पाते है।।
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