Saturday, March 13, 2021

बेटी अगर तुम नहीं होती

बेटी अगर तुम नहीं होती 
बेटी अगर तुम नहीं होती 
तो मैं चुपचाप खोया रहता 
किसी मैगजीन के पन्नो में
और ढूंढता बहाने.... अगला पन्ना पलटने का 
बेटी अगर तुम नहीं होती
तो बदलता रहता टीवी के चैनल
बिना रिमोट कि छिना झपटी के 
और फिर थक हार कर
बन्द कर देता TV को
बेटी अगर तुम नहीं होती
तो मेरे बाल कोई नहीं खींचता 
और मैं वंचित रह जाता
उस मीठे दर्द के सुखद अहसास से 
जो तुम्हारे हाथों बाल खिंचवाने में मिलता है
बेटी अगर तुम नहीं होती 
तो  मुझे घोडा कोई न बनाता
न ही मुझे हिनहिनाने को कहता
बुढापे में बचपन मैं कैसे जी पाता।
बेटी अगर तुम नहीं होती 
तो दूकान पर जाकर सिर्फ दूध ही लेकर आता 
चिप्स के पैकेट और अल्पाइनलिबे वहीँ रह जाती
बेटी अगर तुम नहीं होती
तो सन्डे को लालच देकर किस से 
मालिश करवाता अपने सर पे  
बेटी अगर तुम नहीं होती 
तो भाई कि ज़रा सी चोट पर 
रो रो कर आसमां कौन सर पर उठाता 
बेटी अगर तुम नहीं होती
तो पिछवाड़े आँगन में दिवाली पर 
रावण का वो छोटा पुतला
हर बार जलने से रह जाता 
बेटी अगर तुम नहीं होती
तो कागज़ के सफ़ेद पन्ने 
किस्तियो में नहीं ढलते 
बेटी अगर तुम नहीं होती 
तो ये न होता..वो न होता..
बेटी अगर तुम नहीं होती 
तो ये दुनिया भी नहीं होती 
बेटी अगर तुम नहीं होती
तो ये पिता भी नहीं होता
बेटी अगर तुम नही होती
तो कोई पिता नहीं होता 
बेटी अगर तुम नहीं होती 
बेटी अगर तुम नहीं होती 
 ....

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