आज हमारा दूधवाला न जाने क्यों नही आया,
सर मंडरा रहा था बिन चाय रहने का साया।
हम भी हठी बहुत थे, चाय बिन कइसे रह पाते
उठाई साइकिल, पहुंचे दुकान दूध का पैकेट उठाया
जल्दी जल्दी दूध का दाम चुकाया और साइकिल घुमाया,
दुकान वाला कुछ चिल्लाया, बकाया वापिस का किसपे टाइम था, हमने नही साइकिल वापिस घुमाया।
ऊंघते ऊंघते तेज़ तेज़ साइकिल चलाया
घरवाली को भी तरस नही आया, वापिसी में उसे पूजा में मग्न पाया
हम भी रुकते तो कैसे, झट से पतीला गैस पर चढ़ाया
चाय पत्ती डाली, चीनी मिलाई और एक कप ढूध पैकेट से उल्टाया।
बन्द बन्द आंखों से कप में चाय पलटा कर
कप पकड़ बिस्तर में यू अकड़ कर बैठे जैसे
कोई फौजी जंग लड़ कर वापस आया।
पर जाने क्यों घूंट भरते ही जैसे करंट लगा
इतनी खट्टी जैसे किसी जहर का घूंट भरा
पत्नी तब तक माजरा जान कर खिलखिला रही थी,
मुझे मेरे लाये पैकेट को दिखला रही थी,
पैकेट को देख हमारी हेकड़ी निकल गई
ये दूध की पैकेट लस्सी में कैसे बदल गई।
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