Tuesday, October 19, 2021

एक ऐसी रंगोली दे भगवन

एक ऐसी रंगोली दे भगवन,
वो हंसी ठिठोली दे भगवन,
किलकाता हर मन हो ऐसी
बचपन टोली दे भगवन।।
क्यों बचपन कूड़ा बीन रहा
ये कैसा धर्म और दीन रहा 
कोई सोता है वो रोता है,
जब भूख से व्याकुल होता है
वो ओढ़नी जिसमें दूध मिले,
हर सर वो चोली दे भगवन।
एक ऐसी रंगोली दे भगवन।।
सुनते है आज दिवाली है,
पर उसका पेट क्यों खाली है।
उम्मीदों भूख का पहरा है,
हर सपना ठहरा ठहरा है,
सपनों में उम्मीद का रंग भरे
बस ऐसी होली दे भगवन।।
एक ऐसी रंगोली दे भगवन।।

Saturday, March 13, 2021

चाय का नशा

आज हमारा दूधवाला न जाने क्यों नही आया,
सर मंडरा रहा था बिन चाय रहने का साया।
हम भी हठी बहुत थे, चाय बिन कइसे रह पाते
उठाई साइकिल, पहुंचे दुकान दूध का पैकेट उठाया
जल्दी जल्दी दूध का दाम चुकाया और साइकिल घुमाया,
दुकान वाला कुछ चिल्लाया, बकाया वापिस का किसपे टाइम था, हमने नही साइकिल वापिस घुमाया।
ऊंघते ऊंघते तेज़ तेज़ साइकिल चलाया
घरवाली को भी तरस नही आया, वापिसी में उसे पूजा में मग्न पाया
हम भी रुकते तो कैसे, झट से पतीला गैस पर चढ़ाया
चाय पत्ती डाली, चीनी मिलाई और एक कप ढूध पैकेट से उल्टाया।
बन्द बन्द आंखों से कप में चाय पलटा कर
कप पकड़ बिस्तर में यू अकड़ कर बैठे जैसे
कोई फौजी जंग लड़ कर वापस आया।
पर जाने क्यों घूंट भरते ही जैसे करंट लगा
इतनी खट्टी जैसे किसी जहर का घूंट भरा
पत्नी तब तक माजरा जान कर खिलखिला रही थी,
मुझे मेरे लाये पैकेट को दिखला रही थी,
पैकेट को देख हमारी हेकड़ी निकल गई
ये दूध की पैकेट लस्सी में कैसे बदल गई।

बेटी अगर तुम नहीं होती

बेटी अगर तुम नहीं होती 
बेटी अगर तुम नहीं होती 
तो मैं चुपचाप खोया रहता 
किसी मैगजीन के पन्नो में
और ढूंढता बहाने.... अगला पन्ना पलटने का 
बेटी अगर तुम नहीं होती
तो बदलता रहता टीवी के चैनल
बिना रिमोट कि छिना झपटी के 
और फिर थक हार कर
बन्द कर देता TV को
बेटी अगर तुम नहीं होती
तो मेरे बाल कोई नहीं खींचता 
और मैं वंचित रह जाता
उस मीठे दर्द के सुखद अहसास से 
जो तुम्हारे हाथों बाल खिंचवाने में मिलता है
बेटी अगर तुम नहीं होती 
तो  मुझे घोडा कोई न बनाता
न ही मुझे हिनहिनाने को कहता
बुढापे में बचपन मैं कैसे जी पाता।
बेटी अगर तुम नहीं होती 
तो दूकान पर जाकर सिर्फ दूध ही लेकर आता 
चिप्स के पैकेट और अल्पाइनलिबे वहीँ रह जाती
बेटी अगर तुम नहीं होती
तो सन्डे को लालच देकर किस से 
मालिश करवाता अपने सर पे  
बेटी अगर तुम नहीं होती 
तो भाई कि ज़रा सी चोट पर 
रो रो कर आसमां कौन सर पर उठाता 
बेटी अगर तुम नहीं होती
तो पिछवाड़े आँगन में दिवाली पर 
रावण का वो छोटा पुतला
हर बार जलने से रह जाता 
बेटी अगर तुम नहीं होती
तो कागज़ के सफ़ेद पन्ने 
किस्तियो में नहीं ढलते 
बेटी अगर तुम नहीं होती 
तो ये न होता..वो न होता..
बेटी अगर तुम नहीं होती 
तो ये दुनिया भी नहीं होती 
बेटी अगर तुम नहीं होती
तो ये पिता भी नहीं होता
बेटी अगर तुम नही होती
तो कोई पिता नहीं होता 
बेटी अगर तुम नहीं होती 
बेटी अगर तुम नहीं होती 
 ....

Thursday, February 25, 2021

आयाम

ना जाने इस जीवन के..
कितने है आयाम रे..
कुछ के हमने नाम सुने है..
पर कितने बेनाम रे...
हमने भी कीमत थी मांगी
पल छिन पल छिन कतरे की
सोचा था खूब मोल लगेगी
शोख अदाओं नखरे की
बिक गए हम तो बीच बाज़ारी
बिके मगर बेदाम रे... 
ना जाने इस जीवन के..
कितने है आयाम रे..
पल पल गुज़रा बरसों बरसों
बरस बरस सदियों जैसा
कभी मन ठहरा शांत समन्दर
कभी लहराये नदियो जैसा
कैसी करवट मौसम बदला
अब कौन सुबहा कब शाम रे...

Saturday, September 12, 2020

मयस्सर भी कहां होती है रोटी इस जमाने में

मयस्सर भी कहां होती है रोटी इस जमाने में
किसी की जान निकलती है निवाले दो कमाने में
आज निकले पसीने से फटा वो नोट भी आखिर
कमाया था गला कर जिस्म जो कल के मेहनताने में।।।

होती नींद है छोटी वो छोटी भी जरूरी है,
कि भूखे पेट बच्चों को तो रोटी ही जरूरी है
नहीं अब वो बहलते हैं किसी लोरी के गाने में।।

हाकिम ने कहा था हम गरीबी को मिटा देंगे,
तेरे हर एक सपने को हक़ीक़त कर दिखा देंगे
मिटे कितने मगर सपने उसके झूठे फसाने में।।।

तुझे है शौक सुनने का, तो सुनले ओ महल वाले
महल तेरे की ही खातिर, है इसके पांव में छाले
लहू इसने बहाया है तेरी दुनिया बनाने में।।।।

सुना था एक होता है, कहीं भगवान ऊपर भी
सुनता हर कोई फरियाद, कहीं भगवान ऊपर भी,
मगर बेबस है वो कितना, इसे भी हक़ दिलाने में।।।।


गुजरती उम्र उसकी है किसी का महल बनाने में।।।।

Sunday, June 14, 2020

गमले का फूल


बड़े जतन से आंगन मैंने.....
फूल कोई एक पाला था।।।
पानी और कुछ खाद सहारा
जाने कैसे संभाला था।।
एक दिन उससे कुछ बात हुई....
यूँ छोटी सी मुलाकात हुई...
कुछ उसके गहरे सवाल भी थे
आंखों सपनो के जाल भी थे।।
गमले में मुझको रोका है?
क्यो मुझसे किया ये धोखा है...
मैं भले खिला सा दिखता हूँ...
पर भीतर भीतर रिसता हूँ।।।
यहां तितली कोई नही आती...
कोयल भी गीत नही गाती...
मुझ पर तो छाई उदासी है...
क्यों कैद में जंगल वासी है...
ये सुन कर मैं भी चकराया
फिर मैंने उसको समझाया..
झूठे सपनो को नही बोते..
अब जंगल यहाँ नही होते
ये जंगल हम सब काट चुके
धरती आपस में बाँट चुके
अब धरती खोज न पाओगे
तुम रोते ही रह जाओगे
काहे खुद पे शर्मिंदा हो
खुश रहो कि अब तक जिंदा हो
खुश रहो कि अब तक जिंदा हो........