Friday, January 25, 2013

अश्कों की नमी सी देखी है

तेरी आखों में मैंने कुछ
अश्कों की नमी सी देखी है
धुंधली ही सही कुछ तो मगर
यादे सिमटी देखी है
ख़ामोश है लब तो शिकवा क्या
बेवफा जुबां तो शिकवा क्या
इजहारे मोहब्बत हमने कातिल
नज़रों से होती देखी है
तेरी आखों में मैंने कुछ .......
तेरे बदन की खुश्बू को
मुठ्ठी में भर कर लाया हूँ 
तन्हाई में इससे अपनी
दुनिया महकती देखी है
तेरी आखों में मैंने कुछ .......
साथ मेरा तुम दोगी कब तक
ये बतलाना जरुरी नहीं
पलक झपकते ही हमने ये
दुनिया बदलती देखि है।
तेरी आखों में मैंने कुछ .......


Saturday, January 12, 2013

घर बेच दूँ ?


वो इठलाता, मुस्कुराता, दौड़ कर गले लग जाता है....
मुझे देख कर वो, बस फुला नही समाता है।
और मुहं फुलाए बैठी रहती हैं तुम्हारे शहर की कोठियां.....
मेरे गांव के घर का मुझसे, कुछ अलग ही नाता है।।।


वो कहते है मुझसे
कि घर बेच दूँ
वो बगिया वो अंगना ..डगर बेच दूँ
कोई बतलाये मुझको ....जिऊँगा मैं कैसे
जिन्दगी को अपनी अगर बेच दूँ ...
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ

नहीं है ये घर ...ईंट गारे का घर 
बचपन के सपनों का ......है ये नगर 
कंचे का ताना ...लुका छिप्पी की बारी 
वो गुल्ली और डंडा फिर किश्ती की सवारी 
कैसे सपनो का सागर .....सगर बेच दूँ 
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ

बाबा की लाठी की हुई है खट्खट
भागूं मैं दोस्त , कंचे समेटो फटाफट
कहाँ पे कलम है कहाँ है किताबे 
कहाँ पे है बस्ता,,माँ ज़रा तू बतादे
बाबा से मुझको बस लगता है डर 
कैसे बाबा से लगता, वो..... डर बेच दूँ 
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ  

वो दादी वो बुआ वो चाची वो ताई 
 कभी याद मुझको माँ की ना आई
नहीं है अब भूख बिलकुल भी मैया
चाची ने मुझको है लस्सी पिलाई
मक्की की रोटी दादी ने खिला दी 
बुआ ने सिलबट्टे की चटनी खिलाई
ममता की भर भर के मिलती थी गागर  
कैसे ममता की सारी गागर बेच दूँ 
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ  
वो बगिया वो अंगना ..डगर बेच दूँ
कोई बतलाये मुझको ....जिऊँगा मैं कैसे
जिन्दगी को अपनी अगर बेच दूँ ...
वो कहते हैं मुझसे कि घर बेच दूँ
 





Sunday, December 30, 2012

मायने

बदल गए हैं मायने इंसान के
खिल उठे हैं चेहरे हैवान के
अब नहीं अवतार लेगा ए नवीन
टूट गए हैं हौसले भगवान के .....

मरहम भी लगा देंगे मगर मालूम हो  
जख्म कितने बाकी हैं हिन्दुस्तान के ......

हो गए बुलंद कातिलों के अंदाज़
सबूत छोड़ते हैं अपनी पहचान के ......

हर तरफ मिल जायेंगे अब सनम
क्या करोगे लिख कर पते शमशान के .....

टूट गए हैं हौसले भगवान के .....

Friday, December 28, 2012

पौधारोपण

वन महोत्सव के अवसर पर
एक नेता ने किया उद्घोषण
आज करेंगे हम भी अपने
करकमलों से पौधारोपण
बड़ा हुआ वो वृक्ष  जब सींचा
हुआ अचरज़ बड़ा भारी भरकम
फूल पत्तियों की जगह थी गोली
जगह फलों के लटके थे बम
मत सींचो मतलब की खातिर
तुम देश के नोनिहालों को
सींचो तो फिर सींचो ऐसे
ज्यों किसान खेत खलिहानों को .....ज्यों किसान खेत खलिहानों को।

हलवा

महंगाई के दौर में मेरे
मन ने की भरी गुस्ताखी
भूले भटके किसी कोने से
हलवा खाने की इच्छा जागी।
सर पर बांधा कफ़न
दिल में कुछ हिम्मत जुटाई
कंपकंपाते हुए होठों से
बीबी को इच्छा जतलाई।

तमतमा गया चेहरा उसका
छा गई आँखों में लाली
जपने लगा हनुमान चालीसा
उसने जो कोप दृष्टि डाली।

बोली होश में भी हो तुम
जेब पे अपनी नजर तो डालो
ले आओ सामान तो जानू
चाहे फिर जितना हलवा खालो।

आ गई अब तो आन पे मेरी
मर्दानगी को था ललकारा
लाऊं कहीं से भी पैसे मैं
इसके सिवा नहीं था चारा।

बैंक टटोले, जेब में झाँका
यारो पे भी नजर दोडाई
घिस गई सारी जूती मेरी
कौड़ी मगर हाथ न आई।

मनोदशा को भांप के मेरी
एक ने यूँ हमदर्दी जतलाई
नोट थमा के सौ का मुझको
हाथ घडी मेरी खुलवाई।

इंसानियत भी चीज़ है कोई

ताव दे वो मूँछो पर बोला

क्या होगा पर मेरा कल को
ईमान तुम्हारा  गर जो डोला।

सामान थमा कर बीबी को खैर
फूला नहीं समाया था
सर था मेरा गर्व से ऊँचा
जो किला फ़तह कर आया था।

हलवे की भीनी भीनी खुश्बू
नथुनों से मेरे आ टकराई
बरसों से थी जिसकी तमन्ना
आज वो पूरी होने आई।

किस्मत को मंजूर नहीं थे
सुख के पर मेरे पल ये चार
जाने कहाँ से टपक पड़े हाय
मेरे दूर के रिश्तेदार।

जनम जनम के भूखे मानो
सारे हलवे पर यूँ टूटे
चाट गए बर्तन तक सारे
भाग मेरे हाय यूँ फूटे ...भाग मेरे हाय यूँ फूटे।।।।।।।।








Wednesday, December 26, 2012

चंचल बाला

  

चतुर चपल एक चंचल बाला 
सादगी का ओढ़ दुशाला
जब जब नज़रों से बतियाती
तब तब लगती मधुशाला

चतुर चपल एक चंचल बाला

 

सुरभि बन वो वन महकाए
तन बदन जोबन लहराए
मोती बन वाणी झरती है
जब जब खोले लबों का प्याला

चतुर चपल एक चंचल बाला

 

अमावस सी जुल्फों की छाया
कुंदन तन और कंचन काया
नैनों में है झील बसेरा
मुख मंडल का तेज निराला

 चतुर चपल एक चंचल बाला

 

कोमल मन सी राजकुमारी
कायनात सारी बलिहारी
जिस घर अंगना जायेगी
होगा वो किस्मत वाला

चतुर चपल एक चंचल बाला

 

सादगी का ओढ़ दुशाला
जब जब नज़रों से बतियाती

तब तब लगती मधुशाला

Saturday, December 22, 2012

ए जिन्दगी सता सता तू मुझे और सता

ए जिन्दगी सता सता तू मुझे और सता
भाग जितना भाग सकती है भाग
पर याद रख
तेरा पीछा ना छोडूंगा
भाग कर जायेगी कहाँ
मुझे मालूम है तेरा हर पता ...... ए जिन्दगी सता सता तू मुझे और सता

याद कर बचपन के दिन
जवानी की राते
जब तू रोज़ ..हँस हँस कर मिलती थी
हर दिन इक बहार थी ...तू गुलशन की कली सी खिलती थी
बचपन जवानी क्या बीते .... तू  बीत गयी ...तू रीत गयी 
तू क्यों बीती ..तू क्यों रीती
जरा ये तो बता ....ए जिन्दगी सता सता तू मुझे और सता

तू क्या सोचती है कि मैं डर जाऊंगा
थक जाऊंगा, हार जाऊंगा या मर जाऊंगा
मगर याद रख..
ये तेरी भूल है
मुझे तुझसे प्यार है
और तेरे हर सितम कबूल है
हाँ ..तुझे जो शिकवे शिकायत है
वो और बात है अलबत्ता ......ए जिन्दगी सता सता तू मुझे और सता

तेरी धुप छावं में ...सुबहो और शाम में
मैं पक  चुका  हूँ
पर लोग समझते हैं कि  मैं रुक चुका हूँ ....थक चुका  हूँ
मगर ए जिन्दगी 
ना मैं रुका हूँ ना थका हूँ
मैं समझ गया हूँ जिन्दगी तेरा रंगों को .... तेरे ढंगों को
सुख दुःख आशा निराशा .... उम्मीदों और उमंगो को
और जान गया हूँ जिन्दगी
कि तेरी नहीं इसमें कोई ख़ता
....ए जिन्दगी सता सता तू मुझे और सता
भाग जितना भाग सकती है भाग
पर याद रख
तेरा पीछा ना छोडूंगा
भाग कर जायेगी कहाँ
मुझे मालूम है तेरा हर पता ...... ए जिन्दगी सता सता तू मुझे और सता