Friday, December 28, 2012

हलवा

महंगाई के दौर में मेरे
मन ने की भरी गुस्ताखी
भूले भटके किसी कोने से
हलवा खाने की इच्छा जागी।
सर पर बांधा कफ़न
दिल में कुछ हिम्मत जुटाई
कंपकंपाते हुए होठों से
बीबी को इच्छा जतलाई।

तमतमा गया चेहरा उसका
छा गई आँखों में लाली
जपने लगा हनुमान चालीसा
उसने जो कोप दृष्टि डाली।

बोली होश में भी हो तुम
जेब पे अपनी नजर तो डालो
ले आओ सामान तो जानू
चाहे फिर जितना हलवा खालो।

आ गई अब तो आन पे मेरी
मर्दानगी को था ललकारा
लाऊं कहीं से भी पैसे मैं
इसके सिवा नहीं था चारा।

बैंक टटोले, जेब में झाँका
यारो पे भी नजर दोडाई
घिस गई सारी जूती मेरी
कौड़ी मगर हाथ न आई।

मनोदशा को भांप के मेरी
एक ने यूँ हमदर्दी जतलाई
नोट थमा के सौ का मुझको
हाथ घडी मेरी खुलवाई।

इंसानियत भी चीज़ है कोई

ताव दे वो मूँछो पर बोला

क्या होगा पर मेरा कल को
ईमान तुम्हारा  गर जो डोला।

सामान थमा कर बीबी को खैर
फूला नहीं समाया था
सर था मेरा गर्व से ऊँचा
जो किला फ़तह कर आया था।

हलवे की भीनी भीनी खुश्बू
नथुनों से मेरे आ टकराई
बरसों से थी जिसकी तमन्ना
आज वो पूरी होने आई।

किस्मत को मंजूर नहीं थे
सुख के पर मेरे पल ये चार
जाने कहाँ से टपक पड़े हाय
मेरे दूर के रिश्तेदार।

जनम जनम के भूखे मानो
सारे हलवे पर यूँ टूटे
चाट गए बर्तन तक सारे
भाग मेरे हाय यूँ फूटे ...भाग मेरे हाय यूँ फूटे।।।।।।।।








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