Tuesday, January 14, 2020

gaanv ka makaan

गाँव का कड़ियों वाला मकान,
बहुत याद आता है...
दूर तक फैला तारो वाला आसमान,
बहुत याद आता है...
बादल भी बड़ा अजीब चित्रकार था,
कभी घोडा, कभी बन्दर कभी श्वान,
बहुत याद आता है....
मुंह फुलाए बैठी रहती है शहर की कोठी
हँसता खिलखिलाता गले लगाता कच्चा मकान,
बहुत याद आता है....
दिखावे की जिंदगी ने कैद कर दिया शहर में
खेतों खलिहानों में उड़ते थे ऊँची उड़ान,
बहुत याद आता है....
दादी के चरखे को चला देना बिना मतलब
और दादी का फिर कहना कि हट शैतान,
बहुत याद आता है....

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