देश की माटी चुप रहती है,क्या कहते हो।
इसे शिकायत कितनी तुमसे, कहां रहते हो।
शायद तुम खोए रहते हो, नैनो की मधुशाला में,
जुल्फों की घोर घटाओं में या, मिलन विरह की ज्वाला में।
जब आराम से बैठे थे तुम, अपनी महल अटारी में,
पुलवामा में हुई शहादत, दुश्मन की कारगुज़ारी में।
भारत मां की पीड़ा को, सच में सहते हो?
इसे शिकायत कितनी तुमसे कहां रहते हो..
छोड़ो अब गलबहियों को, मत करना कोई शमां को रोशन,
भड़का लो अब मन की ज्वाला, जगा लो अब भीतर का यौवन।
दुश्मन आखिर कब समझा है, प्यार मोहब्बत की बात भी,
व्यर्थ गया लाहौर उतरना, व्यर्थ गई सब मुलाकात भी।
प्यार मोहब्बत की गंगा में, क्यूं बहते हो?
इसे शिकायत कितनी तुमसे कहां रहते हो..
अब ये बात बता दो उसको, आस मोहब्बत की मत रखना।
एक गोली के बदले प्यारे, दस दस गोली को तुम चखना।
अब ना कोई रहमत है और, अब दरकार ना माफी है,
गीदड़ का दिल दहलाने को एक ललकार ही काफी है।
उस गीदड़ की भभकी को, क्यूं सहते हो
इसे शिकायत कितनी तुमसे कहां रहते हो..
देश की माटी चुप रहती है,क्या कहते हो।
इसे शिकायत कितनी तुमसे, कहां रहते हो।
Thursday, March 21, 2019
देश की माटी
Sunday, March 17, 2019
प्रभु मीत
तुझसे प्रभु जब मीत हुई,
कब हार हुई कब जीत हुई,
मैं नादां अब जाना ये सब,
तेरी माया तेरी रीत हुई।
अब शिकवा न शिकायत है,
जब सब तेरी ही इनायत है
फिर काहे की भीत हुई।।
🙏
होली
कुछ हंसी ठिठोली हो जाए,
मन की रंगोली हो जाए,
इस बार करो कुछ कान्हा ऐसा,
हर दिन मेरा होली हो जाए
मिलने का वादा कर ना सको
अगर इरादा कर ना सको
इतना सा मिलन ही कर लेना,
तेरे रंग मेरी चोली हो जाए।।
नज़रों से मिलना मत नज़रे
पर आंख मिचौली हो जाए।
Monday, March 11, 2019
ग़म ए जिंदगी
कुछ मुस्कुराते फूल ख्वाबों में सजा लेता हूं।
अरमानों की बारात, दिल में बुला लेता हूं,
इसी कशमकश में उलझा कर ज़िन्दगी को,
खुदा कसम उसको उसका हर ग़म भुला देता हूं।
Sunday, March 10, 2019
शमा
अगर शमा से परवाना, कहीं नाराज हो जाए,
नए अफसाने का फिर से कोई आगाज़ हो जाए।
कि परवाने पे मरने को तरस जाए ये शमा भी,
मोहब्बत का यही आगे नया अंदाज़ हो जाए
Saturday, March 9, 2019
मेरे अपने
मेरे अपने ही मुझे आजमाने लगे है
दूरियों से रिश्ते निभाने लगे है
पल में तोड़ दिए वो सपने
जिन्हे बुनने में मुझे जमाने लगे है
शरीफ
तेरी चाहत में गुनगुनाना गुनाह हो गया
लोग माहिर काफिया ओ रद्दीफ समझ बैठे।
असर सोहबत का ही तो रहा होगा,
कातिलाना पेशा था, वो शरीफ समझ बैठे।
काफिया गमगीन है की रदिफ नजर नहीं आता।
खबरे लाल है, शहर में शरीफ नजर नहीं आता।