Thursday, March 21, 2019

देश की माटी

देश की माटी चुप रहती है,क्या कहते हो।
इसे शिकायत कितनी तुमसे, कहां रहते हो।
शायद तुम खोए रहते हो, नैनो की मधुशाला में,
जुल्फों की घोर घटाओं में या, मिलन विरह की ज्वाला में।
जब आराम से बैठे थे तुम, अपनी महल अटारी में,
पुलवामा में हुई शहादत, दुश्मन की कारगुज़ारी में।
भारत मां की पीड़ा को, सच में सहते हो?
इसे शिकायत कितनी तुमसे कहां रहते हो..
छोड़ो अब गलबहियों को, मत करना कोई शमां को रोशन,
भड़का लो अब मन की ज्वाला, जगा लो अब भीतर का यौवन।
दुश्मन आखिर कब समझा है, प्यार मोहब्बत की बात भी,
व्यर्थ गया लाहौर उतरना, व्यर्थ गई सब मुलाकात भी।
प्यार मोहब्बत की गंगा में, क्यूं बहते हो?
इसे शिकायत कितनी तुमसे कहां रहते हो..
अब ये बात बता दो उसको, आस मोहब्बत की मत रखना।
एक गोली के बदले प्यारे, दस दस गोली को तुम चखना।
अब ना कोई रहमत है और, अब दरकार ना माफी है,
गीदड़ का दिल दहलाने को एक ललकार ही काफी है।
उस गीदड़ की भभकी को, क्यूं सहते हो
इसे शिकायत कितनी तुमसे कहां रहते हो..
देश की माटी चुप रहती है,क्या कहते हो।
इसे शिकायत कितनी तुमसे, कहां रहते हो।

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