Friday, August 22, 2025

रिटायरमेंट 2

हुए रिटायर चलो ये माना 
अभी रवानी मगर है बाकी
अभी पुराना सफर है बीता
अभी सुहाना सफर है बाकी

वो मस्तियों का ही दौर होगा
नहीं रहेगी कोई भी टेंशन 
शुक्र खुदा का कि हर महीने
आयेगी खाते में एक पेंशन 
करेंगे सजदा हर एक दर पर
अभी तलक जो भी दर है बाकी...हुए रिटायर चलो ये माना 

Tuesday, August 19, 2025

भारत के लाल

इस भारत की भूमि पर
कायर आंसू न टपकाना
ये खून मांगती बलिदान का
हिम्मत हो तो आ जाना

Monday, August 4, 2025

फिजिकल फाइलों वाले दिन

याद बहुत आते हैं फिजिकल फाइलों वाले दिन
मैन्युअल था हर काम मगर थे समाईलों वाले दिन 

अब तो एक सी सबकी लिखावट खो गई है कलाकारी छोटी आई के ऊपर थे लगाते हम बिंदी बड़ी भारी
जलेबी जैसे सिग्नेचर के स्टाइलों वाले दिन

E office तो बहुत ही बढ़िया पर एक है मजबूरी
कैंटीन बैठ भी निपटाते जो फाइल बहुत जरूरी
अरे कैसे आए OTP मोबाइलों वाले दिन

रंग-बिरंगे फ्लैग से सज कर फाइल लगती थी न्यारी 
कुछ टेढ़े कुछ मेढ़े कुछ की टपकन की तैयारी
ना चिपकू हर फ्लैग को भी चिपकाएलो वाले दिन
 


Saturday, July 26, 2025

Retirement रिटायरमेंट guleria maama

प्रमोशन रिटायरमेंट सरकारी कहानी है 
Retirement nahi kuchh bas ek sarkari kahani hai
Ghar ki jimmedari bhi to hamne sb nibhani hai...
Abhi to saath guzre hai abhi ek umar baaki hai
Khatam office ki sb baate ab aage jindgani hai....

कहीं है दौर खुशियों का कहीं आंखों में पानी है 
अभी तो साठ गुजरे हैं अभी एक उम्र बाकी है 
खत्म फाइल के सब झंझट अब आगे जिंदगानी है। 

बिछड़ना तो मुकद्दर पर, घड़ी मुश्किल की है लेकिन लिखावट होगी सरकारी, कलम तो दिल की है लेकिन 
नहीं हम भूल पाएंगे कभी भी आपको देखो
यहां का जर्रा जर्रा आपकी मेहनत निशानी है

Hamne dekha sda hi aap rahe the daudte bhage
Sun kar gum hamaare aap, roye raat bhar jaage.
Ghar ke jo bade hote yahi unki kahaani hai
Labo par muskurahat hai magar aankho me paani hai....




Tuesday, April 8, 2025

बदौलत मयखाना है

दम भरते रहे उम्र भर
कि मेहनतकश तबियत है
नहीं मालूम था कि दम
बदौलत मयखाना है

मेरे मरने का हर सामान
इस दुनिया ने तो जोड़ा है
मगर जिंदा है अब तक हम 
बदौलत मयखाना है

Wo insaano ki basti me 
Agar mil jaaye to pakka
Jo raunak hai wo raunak bhi
Badolat maykhana hai...


Tuesday, October 19, 2021

एक ऐसी रंगोली दे भगवन

एक ऐसी रंगोली दे भगवन,
वो हंसी ठिठोली दे भगवन,
किलकाता हर मन हो ऐसी
बचपन टोली दे भगवन।।
क्यों बचपन कूड़ा बीन रहा
ये कैसा धर्म और दीन रहा 
कोई सोता है वो रोता है,
जब भूख से व्याकुल होता है
वो ओढ़नी जिसमें दूध मिले,
हर सर वो चोली दे भगवन।
एक ऐसी रंगोली दे भगवन।।
सुनते है आज दिवाली है,
पर उसका पेट क्यों खाली है।
उम्मीदों भूख का पहरा है,
हर सपना ठहरा ठहरा है,
सपनों में उम्मीद का रंग भरे
बस ऐसी होली दे भगवन।।
एक ऐसी रंगोली दे भगवन।।

Saturday, March 13, 2021

चाय का नशा

आज हमारा दूधवाला न जाने क्यों नही आया,
सर मंडरा रहा था बिन चाय रहने का साया।
हम भी हठी बहुत थे, चाय बिन कइसे रह पाते
उठाई साइकिल, पहुंचे दुकान दूध का पैकेट उठाया
जल्दी जल्दी दूध का दाम चुकाया और साइकिल घुमाया,
दुकान वाला कुछ चिल्लाया, बकाया वापिस का किसपे टाइम था, हमने नही साइकिल वापिस घुमाया।
ऊंघते ऊंघते तेज़ तेज़ साइकिल चलाया
घरवाली को भी तरस नही आया, वापिसी में उसे पूजा में मग्न पाया
हम भी रुकते तो कैसे, झट से पतीला गैस पर चढ़ाया
चाय पत्ती डाली, चीनी मिलाई और एक कप ढूध पैकेट से उल्टाया।
बन्द बन्द आंखों से कप में चाय पलटा कर
कप पकड़ बिस्तर में यू अकड़ कर बैठे जैसे
कोई फौजी जंग लड़ कर वापस आया।
पर जाने क्यों घूंट भरते ही जैसे करंट लगा
इतनी खट्टी जैसे किसी जहर का घूंट भरा
पत्नी तब तक माजरा जान कर खिलखिला रही थी,
मुझे मेरे लाये पैकेट को दिखला रही थी,
पैकेट को देख हमारी हेकड़ी निकल गई
ये दूध की पैकेट लस्सी में कैसे बदल गई।