Saturday, March 23, 2019

उमंग

1212121212,1212121212
लो छट गई तमस घटा, है छा गई उमंग फिर।
समीर गुनगुना गई, है छेड़ कर तरंग फिर।
मै फासलों से फासले, जो नाप लूं अगर कहीं,
कि हाथ थाम कर मेरा, जो तुम चलोगे संग फिर।।

अगर गिरा है पात तो, कहीं खिला है फूल भी,
कि मंजिलों को ढूंढती, है रास्तों की धूल भी,
कदम कदम डगर डगर, शहर शहर गली गली,
ये आस्मां में उड़ रहा, है हसरतों का रंग फिर।।

चमक रहा है चांद भी, कि दूर आसमान में,
बिखर गई है चांदनी, उतर के इस जहान में,
स्वर्ग सी खिली खिली, धरा बनी दुल्हन कोई,
चरण कमल पखारता, ये जलधि हो उतंग फिर।।

घुमड़ रहे इन बादलों, का शोर भी अजीब है,
धरा को चूमने गगन, तो आ गया करीब है,
कि प्यास प्यास बुझ रही है, बूंद बूंद ओस से,
ये मन मयूर उड़ रहा है, बन के अब पतंग फिर।।

===नवीन कुमार रोहिल्ला===

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